ॐ परमाय मन्त्राय नमः : शिव क्यों कहलाते हैं परम मन्त्र? एक शास्त्रीय एवं दार्शनिक अध्ययन

1. प्रस्तावना

भारतीय चिन्तन-परम्परा में मन्त्र की अवधारणा केवल ध्वन्यात्मक संरचना तक सीमित नहीं रही। मन्त्र को वहाँ एक ऐसी चेतना-शक्ति के रूप में जाना गया है जो वाणी और अर्थ की द्वैत-सीमा से परे जाकर साधक की अन्तर्चेतना को एक विशेष आयाम में प्रतिष्ठित करती है। जब शिव-सहस्रनाम में शिव को ‘परम मन्त्र’ कहा जाता है — अर्थात् वे स्वयं परम मन्त्र हैं — तो यह कथन केवल स्तुतिपरक नहीं, बल्कि गहन आध्यात्मिक-दार्शनिक प्रतिज्ञा है।

‘परमाय मन्त्राय’ — इन दो पदों के संयोग में एक सम्पूर्ण ब्रह्मविद्या निहित है। प्रश्न उठता है : यदि शिव स्वयं मन्त्र हैं, तो फिर मन्त्र से किसकी उपासना होती है? यदि उपास्य और उपासना-साधन एक ही हो, तो साधना का स्वरूप क्या रहता है? यह नाम इसी मूलभूत प्रश्न का उत्तर अपने भीतर धारण करता है — और उत्तर देता है कि शिव-तत्त्व में साधन और साध्य, मन्त्र और मन्त्री, उपाय और उपेय — सब एकाकार हो जाते हैं।

इस अध्याय का केन्द्र-बिन्दु दार्शनिक है, विशेषतः कश्मीर शैवदर्शन की शब्द-शक्ति और मन्त्र-विज्ञान की दृष्टि से। साथ ही वैदिक, पौराणिक और साधना-परम्परा के प्रमाणों से इस नाम की बहुस्तरीय अर्थ-गहराई का उद्घाटन किया जाएगा।

२. नाम की व्युत्पत्ति एवं शब्द-विज्ञान

समास-विग्रह

‘परमाय मन्त्राय’ — यह पद ‘नमः’ योगे चतुर्थी (अष्टाध्यायी २.३.१६) के नियम से चतुर्थ्यन्त रूप में प्रतिष्ठित है। इसके दार्शनिक विग्रह निम्नानुसार हैं :

१. कर्मधारय समास : परमश्चासौ मन्त्रश्च — जो स्वयं परम (सर्वोत्कृष्ट) है और मन्त्र स्वरूप भी है, उस शिव को नमस्कार।

२. षष्ठी तत्पुरुष (अधीश्वर अर्थ में) : परमाणां मन्त्राणां यः स्वामी/अधिपतिः सः — समस्त उत्कृष्ट मन्त्रों के जो परम स्वामी हैं।

३. बहुव्रीहि समास : परमो मन्त्रो यस्य तत्-स्वरूपं वा — जिसका परम स्वरूप ही मन्त्रमय या वाङ्मय है।

‘परम’ पद का भाषाशास्त्रीय एवं पाणिनीय विवेचन

पाणिनीय व्याकरण के अतिशायन प्रत्यय प्रकरण (अष्टाध्यायी ५.३.५५ — ‘तमबिष्ठनौ’) के अन्तर्गत ‘पर’ शब्द से ‘तमप्’ प्रत्यय के ‘अम्’ रूप से ‘परम’ शब्द निष्पन्न होता है (जहाँ ‘अम्’ प्रत्यय ‘तमप्’ का ही अर्थबोधक रूप है)। यह तुलनात्मक एवं निरुपाधिक उत्कृष्टता का वाचक है, जिसका अर्थ है — ‘जिससे परे या श्रेष्ठ अन्य कुछ न हो’ (परमत्व)। लोक-निरुक्ति में ‘पर + म’ कहकर ‘पर का मर्दन या अतिक्रमण करने वाला’ जो कहा जाता है, वह दार्शनिक अर्थवाद है, पारम्परिक लोक-निरुक्ति मात्र है।

‘मन्त्र’ पद का धातु-विवेचन

पाणिनीय धातुपाठ और व्याकरण महाभाष्य के अनुसार ‘मन्त्र’ शब्द की व्युत्पत्ति मुख्यतः √मन्त्रि गुप्तभाषणे (चुरादिगण, आत्मनेपद) धातु से घञ् अथवा अच् प्रत्यय करने पर होती है, जिसका अर्थ विचार, मन्त्रणा या गुह्य का विमर्श है।

निरुक्त-परम्परा की व्युत्पत्तिपरक शैली और परवर्ती भाष्य-साहित्य के अनुसार इसका दार्शनिक विग्रह है :

मननात् त्रायते इति मन्त्रः

— जो मनन करने पर संसार-भय या अज्ञान से त्राण/रक्षा करे, वह मन्त्र है।

वैकल्पिक रूप से — ‘मन्यते ज्ञायते अनेन इति’ — जिसके द्वारा परमेश्वर के वास्तविक स्वरूप का मनन या साक्षात्कार किया जाए। पाणिनि के अष्टाध्यायी में ‘मन्त्र’ का प्रयोग वेद-वाक्य के अर्थ में होता है, परन्तु आगम-परम्परा में ‘मन्त्र’ चेतना का वह स्पन्द है जो देवता-तत्त्व को सीधे अभिव्यक्त करता है।

अर्थ-विस्तार

‘परम मन्त्र’ का अर्थ केवल ‘श्रेष्ठ मन्त्र’ नहीं है। इसमें निम्नलिखित अर्थ-स्तर हैं :

उत्कर्षात्मक — सभी मन्त्रों में सर्वश्रेष्ठ जो है।

मूलात्मक — जो सभी मन्त्रों का उद्गम है।

तात्त्विक — जो स्वयं मन्त्र-स्वरूप है, अर्थात् वाक्-तत्त्व और अर्थ-तत्त्व का अभेद।

अतिक्रामक — जो मन्त्र की परम्परागत परिधि से परे है; अर्थात् जो मन्त्र और मन्त्री के भेद को भी लाँघ जाता है।

३. शास्त्रीय आधार

वैदिक परम्परा

ऋग्वेद संहिता में मन्त्र और वाक् को परम चेतना का साक्षात् माध्यम माना गया है। उपनिषद् एवं ब्राह्मण ग्रन्थों में वाक् और ब्रह्म की तात्त्विक एकता स्थापित करते हुए ‘वाक्’ को ब्रह्म-स्वरूप माना गया है। इस सन्दर्भ में छान्दोग्योपनिषद् (७.१.१) का ‘वाग् ब्रह्मेत्युपास्व’ सिद्धान्त अकाट्य एवं प्रामाणिक बीजतत्त्व है। वैदिक-ब्राह्मण परम्परा में वाक्-ब्रह्म की इसी तादात्म्यता को संक्षेप में ‘वाग् वै ब्रह्म’ सूक्ति के रूप में भी स्मरण किया जाता है, जो शब्द और ब्रह्म के अभेद को दर्शाती है।

श्वेताश्वतर उपनिषद् के तृतीय अध्याय में रुद्र को सम्पूर्ण वाक्, मन्त्र और सृष्टि का मूल कारण मानते हुए कहा गया है :

यो देवानां प्रभवश्चोद्भवश्च विश्वाधिपो रुद्रो महर्षिः। हिरण्यगर्भं जनयामास पूर्वं स नो बुद्ध्या शुभया संयुनक्तु॥

(श्वेताश्वतर उपनिषद्, तृतीय अध्याय)

बृहदारण्यक उपनिषद् (अध्याय १, ब्राह्मण ३) के प्राण-वाक् संवाद प्रसंग में वाक् की परम शक्ति का निरूपण है, जहाँ आध्यात्मिक संवाद के माध्यम से वाक् को श्रेष्ठता और ब्रह्म-स्वरूपता प्रदान की गई है।

आगम एवं तन्त्र परम्परा

शैव आगमों में शिव को मन्त्रों का अधिष्ठाता और सर्वमन्त्रमय कहा गया है। कामिकागम के ‘पूर्वभाग’ के अन्तर्गत ‘मन्त्रपाद’ विभाग में यह आगमिक भावना परिलक्षित होती है, जिसे शोध-परम्परा में इस प्रकार उद्धृत किया जाता है :

मन्त्राणाम् अधिपः शम्भुः सर्वमन्त्रमयः शिवः।

(यह पंक्ति आगमों के मन्त्र-गौरव को दर्शाने वाली एक परम्परागत आगमिक भावना है।)

विज्ञानभैरव में मन्त्र की तात्त्विक परिभाषा देते हुए ध्वनि के विसर्गान्त स्पन्द को ही शिव-साक्षात्कार का माध्यम माना गया है। पारम्परागत रूप से संकलित यह धारणा-श्लोक इस प्रकार है :

वर्णस्य अन्तर्गते वह्नौ विसर्गान्ते महाभये। यः स्फुरत्यात्मभूः साक्षात् तं देवमभिजानते॥

(विज्ञानभैरव)

स्पन्दकारिका (१.१) में भी शिव को स्पन्द-स्वरूप कहा गया है :

यस्योन्मेषनिमेषाभ्यां जगतः प्रलयोदयौ। तं शक्तिचक्रविभवप्रभवं शङ्करं नुमः॥

(स्पन्दकारिका, १.१)

पौराणिक एवं महाभारती साक्ष्य

महाभारत के अनुशासन पर्व के अन्तर्गत शिव-सहस्रनाम स्तोत्र में शिव को ‘परम’ और ‘मन्त्र’ विशेषणों से पृथक्-पृथक् विभूषित किया गया है। शिवपुराण की विद्येश्वर संहिता में पञ्चाक्षर मन्त्र (नमः शिवाय) को शिव का वाङ्मय विग्रह मानते हुए कहा गया है :

पञ्चाक्षरं परं मन्त्रं सर्वमन्त्रोत्तमं विदुः।

(शिवपुराण, विद्येश्वर संहिता)

४. पौराणिक प्रसंग एवं परम्परागत व्याख्या

ओंकार-उद्भव का आख्यान

शिवपुराण की रुद्रसंहिता के अन्तर्गत लिंगोद्भव प्रसंग में वर्णित है कि जब ब्रह्मा और विष्णु के मध्य श्रेष्ठता का विवाद हुआ, तब एक अनन्त ज्योतिर्लिंग प्रकट हुआ। पौराणिक आख्यान और शैव परम्परागत व्याख्या के अनुसार उस लिंग से स्वतः ही ‘अ’, ‘उ’, ‘म’ और अर्धमात्रा (प्रणव नाद) का प्राकट्य हुआ। पौराणिक दृष्टि से यह आख्यान संकेत करता है कि मन्त्र की उत्पत्ति किसी मनुष्यीय प्रयत्न से नहीं होती; वह नित्य है, अपौरुषेय है — और इसी नित्य वाक् का नाम शिव है।

नन्दी और पञ्चाक्षर

शैव परम्परा में यह प्रसिद्ध है कि नन्दी ने शिव के मुख से पञ्चाक्षर का श्रवण किया। स्कन्दपुराण के काशीखण्ड के पञ्चाक्षर-माहात्म्य प्रसंग में इस भाव को परम्परागत व्याख्या के रूप में (बिना श्लोक-संख्या के, केवल पारम्परिक आख्यान सन्दर्भ के अन्तर्गत) इस प्रकार अभिव्यक्त किया गया है :

अहमेव परं मन्त्रं नमः शिवायेति प्रोच्यते। यो जपेत् सततं भक्त्या स मां प्राप्नोत्यसंशयम्॥

भिन्न परम्पराओं में व्याख्या-भेद

शाक्त-परम्परा में ‘परम मन्त्र’ को शक्ति का अधिष्ठान माना जाता है, जहाँ मन्त्र और शक्ति अभिन्न हैं। किन्तु शैव-परम्परा में यह अभिन्नता शिव-केन्द्रित है — शिव न केवल मन्त्र के अर्थ हैं, बल्कि मन्त्र की ध्वनि-संरचना भी उन्हीं की स्पन्द-शक्ति की अभिव्यक्ति है।

५. प्रतीकात्मक एवं मनोवैज्ञानिक अर्थ

मन्त्र : चेतना का वाहन या चेतना स्वयं?

साधना-मनोविज्ञान की दृष्टि से मन्त्र-जप एक विशेष प्रकार का चित्त-संस्कार है। जब कोई साधक किसी मन्त्र का निरन्तर जप करता है, तो वह मन्त्र क्रमशः उसके चित्त की गहरी परतों में उतरता जाता है। एक सीमा पर पहुँचकर जप और जापक के बीच का भेद मिट जाता है। तब जो शेष रहता है, वह ‘परम मन्त्र’ की अवस्था है — जहाँ न जप है, न जापक; केवल मन्त्र-सत्ता की शुद्ध चेतना है। शिव उस अवस्था के प्रतीक हैं जहाँ चेतना और शब्द एकाकार हो जाते हैं।

वाणी के चार स्तर और परम मन्त्र

भारतीय वाक्-दर्शन (विशेषतः भर्तृहरि के वाक्यपदीय) में वाक् के चार स्तर स्वीकृत हैं :

स्तरस्वरूप
वैखरीउच्चारित, श्रव्य वाणी
मध्यमामानसिक, अनुच्चारित वाणी
पश्यन्तीबुद्धि-स्तरीय, अखण्ड वाणी
पराचेतना का निर्विशेष स्पन्द; शब्द और अर्थ के पूर्व की अवस्था

सामान्य मन्त्र वैखरी या मध्यमा पर क्रियाशील होते हैं। पश्यन्ती पर पहुँचने पर मन्त्र का अर्थ सहजता से बोध होने लगता है। लेखकीय व्याख्या के अनुसार, ‘परम मन्त्र’ परा-वाक् की ओर उन्मुख पश्यन्ती का वह प्रदीप्त रूप है जहाँ शब्द और अर्थ अभिन्न होकर शुद्ध प्रकाश की ओर अग्रसर होते हैं।

६. दार्शनिक विवेचन

कश्मीर शैवदर्शन (त्रिक मत)

आचार्य अभिनवगुप्त ने तन्त्रालोक तथा क्षेमराज ने प्रत्यभिज्ञाहृदयम् में मन्त्र-विज्ञान का अत्यन्त परिष्कृत दार्शनिक रूप प्रस्तुत किया है। इनके अनुसार, मन्त्र की शक्ति केवल बाह्य अक्षरों के उच्चारण में नहीं है, बल्कि उस ‘विमर्श’ (Self-awareness) में है जो अक्षरों के उदय और अस्त के मध्य प्रकाशित होती है। शिव स्वयं ‘प्रकाश-विमर्शमय’ हैं — अर्थात् शुद्ध प्रकाश (चित्) और उसका स्व-संवेदन (विमर्श)।

इसे अक्षरों के मध्य की ‘अन्तःस्पन्द’ या ‘विमर्श’ की अवस्था कहा जाता है, जिसे समकालीन भावानुवाद में कई बार ‘शून्य-सन्धि’ भी कह दिया जाता है (यद्यपि मूल ग्रन्थों में विमर्श या स्पन्द ही पारिभाषिक शब्द हैं)। ‘परम मन्त्र’ वास्तव में पश्यन्ती वाक् की वह प्रदीप्त अवस्था है जो परा-वाक् (शुद्ध चेतना) की ओर पूर्णतः उन्मुख होती है। उत्पलदेवकृत ईश्वरप्रत्यभिज्ञाकारिका के अनुसार परमेश्वर की विमर्श-शक्ति ही वाक्-शक्ति है, जो मन्त्रों का मूलाधार है।

अद्वैत वेदान्त

शङ्कराचार्य की परम्परा में ब्रह्म को शब्द-ब्रह्म और परब्रह्म — दो रूपों में जाना जाता है। मन्त्र शब्द-ब्रह्म का प्रतिनिधि है। परन्तु ‘परम मन्त्र’ वह है जहाँ शब्द-ब्रह्म और परब्रह्म के बीच का भेद भी नहीं रहता। भर्तृहरि के वाक्यपदीय (१.१) के अनुसार :

अनादिनिधनं ब्रह्म शब्दतत्त्वं यदक्षरम्। विवर्ततेऽर्थभावेन प्रक्रिया जगतो यतः॥

शैव सिद्धान्त, पाशुपत एवं योग दर्शन

शैव सिद्धान्त : मन्त्र को देवता का सूक्ष्म शरीर माना जाता है। शिव का परम-मन्त्र-स्वरूप यह सूचित करता है कि उनकी सत्ता शुद्ध वाङ्मय-चेतना में है।

पाशुपत दर्शन : शिव को जगत् का ‘कारण’ माना जाता है। मन्त्र उस कारण-तत्त्व का प्रकटन है; अतः परम मन्त्र = परम कारण = शिव।

योग दर्शन : पातञ्जल योगसूत्र (१.२७-२८) के अनुसार :

तस्य वाचकः प्रणवः। तज्जपस्तदर्थभावनम्॥

यहाँ प्रणव (ॐ) को ईश्वर का वाचक कहना ही ‘परम मन्त्र’ की योग-दर्शनीय अभिव्यक्ति है।

७. प्रतीक एवं प्रतिमा-विज्ञान

ओंकार और शिव

शैव परम्परा में शिव को ‘ओंकारेश्वर’ रूप में भी जाना जाता है। माण्डूक्योपनिषद् में ओंकार के चार अवयवों (अ, उ, म, और अर्धमात्रा) और चेतना के चार स्तरों की समानता स्थापित की गई है। परम्परागत शैव व्याख्या में शिव-तत्त्व तुरीयातीत है — वह चतुर्थ के भी परे है। अतः शिव जो ‘परम मन्त्र’ हैं, वे ओंकार के परे की अवस्था के प्रतीक भी हैं।

लिंग, नाद एवं यन्त्र-विज्ञान

आगम-परम्परा (जैसे अजितागम, मृगेन्द्रागम आदि के लिंग-लक्षण प्रकरण) में शिव-लिंग को नाद-ब्रह्म का मूर्त प्रतीक माना जाता है। इसी प्रकार शैव यन्त्र-विज्ञान की परम्परागत मान्यता के अनुसार शिव-यन्त्र में बिन्दु-केन्द्र को परानाद का स्थान माना जाता है। यह परानाद ही ‘परम मन्त्र’ का यान्त्रिक-प्रतीकात्मक रूप है — जहाँ समस्त विस्तार एक बिन्दु में संकुचित हो जाता है।

८. मन्त्र, ध्वनि एवं नाद-विज्ञान

पञ्चाक्षर मन्त्र का तान्त्रिक कृत्य-चक्र

शैवसिद्धान्त एवं विशिष्ट तान्त्रिक परम्परा में पञ्चाक्षर मन्त्र ‘नमः शिवाय’ के अक्षरों का सम्बन्ध पञ्चभूतों एवं शिव के पञ्चकृत्यों के साथ जोड़ा गया है। यह एक विशिष्ट परम्परागत व्याख्या है :

अक्षरतत्त्वशिव-कृत्य (विशिष्ट परम्परानुसार)
पृथ्वीतिरोभाव (तिरोधान)
जलअनुग्रह
शिअग्निसृष्टि
वावायुस्थिति
आकाशसंहार

(नोट : यह शैवसिद्धान्त की विशिष्ट व्याख्या है; विभिन्न आगमों और आचार्यों में इस सम्बन्ध-निर्धारण में मतभेद उपलब्ध हैं।)

मन्त्र-साधना के स्तर एवं अजपा

तन्त्रालोक के अनुसार साधना स्थूल उच्चारण से आरम्भ होकर मानसिक जप और तदनन्तर चेतना के गहरतर स्तरों तक की यात्रा है। जब मन्त्र बिना किसी प्रयत्न के स्वयं स्फुरित होने लगे, तो उसे ‘अजपा’ कहा जाता है। नाथ-परम्परा के ग्रन्थ गोरक्षशतक (पारम्परागत पाठ) के अनुसार :

अजपा नाम गायत्री योगिनां मोक्षदायिनी।

प्रणव और परम मन्त्र

माण्डूक्योपनिषद् के अनुसार ‘ओम् इत्येतत् सर्वम्’ — ॐ ही सब कुछ है। यह प्रणव ‘परम मन्त्र’ का सर्वमान्य स्वरूप है, जहाँ ‘परम मन्त्र’ = तुरीयातीत ॐ।

९. ध्यान, उपासना एवं साधना

ध्यान का विषय

‘परमाय मन्त्राय’ का ध्यान करते समय साधक की दृष्टि इस ओर निर्दिष्ट होती है कि जो मन्त्र वह उच्चारित कर रहा है, वह शिव की चेतना का ही विस्तार है। ‘जप’ से ‘जापक’ और ‘जाप्य’ के भेद के धीरे-धीरे विगलित होने का अभ्यास ही इस नाम की साधनात्मक दिशा है।

साधना की दिशा

प्रथम चरण : मन्त्र का स्थूल जप — वैखरी स्तर पर।

द्वितीय चरण : मन्त्र का मानसिक जप — मध्यमा स्तर पर।

तृतीय चरण : मन्त्र के अर्थ की गहन भावना — पश्यन्ती की ओर।

चतुर्थ चरण : मन्त्र और चेतना का अभेद-बोध — परा-स्तर।

यह क्रम कश्मीर शैवदर्शन और शैव आगमों दोनों में स्वीकृत है।

१०. आधुनिक जीवन में प्रासंगिकता

भाषा और संवाद : जब हम यह मानते हैं कि शब्द केवल संकेत नहीं बल्कि चेतना के वाहन हैं, तो संवाद की गुणवत्ता बदल जाती है। शब्द-चुनाव, स्वर-लय और वाक्-शक्ति के प्रति सजगता ‘मन्त्र-बोध’ की सामाजिक अभिव्यक्ति है।

शिक्षा : शिक्षक का शब्द जब प्रामाणिकता और अनुभव से निकलता है, तब वह मन्त्र की भाँति काम करता है। ‘परम मन्त्र’ की अवधारणा शिक्षा को केवल सूचना-प्रसारण से ऊपर उठाती है।

मानसिक स्वास्थ्य : मन्त्र-जप की प्रक्रिया आधुनिक माइंडफुलनेस के निकट है। ‘परम मन्त्र’ का विचार यह जोड़ता है कि अवधान उस चेतना-स्पन्द पर लगाया जाए जो ध्वनि और अर्थ को एकसाथ धारण करती है।

आध्यात्मिक जीवन : यह नाम हर साधक को स्मरण दिलाता है कि मन्त्र-जप का अन्तिम लक्ष्य मन्त्र और जापक के भेद को मिटाना है — और यह भेद मिटना ही शिव-तत्त्व में प्रवेश है।

११. भारतीय चिन्तन में इस नाम का स्थान

शिव-सहस्रनाम में अनेक नाम शिव के गुणों, कृत्यों, रूपों और तत्त्वों का वर्णन करते हैं। परन्तु ‘परमाय मन्त्राय’ एक विलक्षण नाम है — यह शिव को किसी बाह्य गुण से नहीं, बल्कि वाक्-तत्त्व और चेतना-सत्ता की मूल संरचना से जोड़ता है।

‘महायोगिने’ सूचित करता है कि शिव योगी हैं; ‘महेश्वराय’ सूचित करता है कि शिव सर्वशक्तिमान ईश्वर हैं। परन्तु ‘परमाय मन्त्राय’ यह स्थापित करता है कि शिव स्वयं वह माध्यम हैं जिसके द्वारा सत्य का ज्ञान होता है।

यह नाम शिव-सहस्रनाम की ज्ञानमीमांसीय (Epistemological) परत को उजागर करता है। शिव न केवल उपास्य हैं — वे उपासना का उपकरण (मन्त्र) भी हैं, और उपासना का फल (ज्ञान) भी।

१२. जीवनोपयोगी शिक्षाएँ

१. शब्द को सचेतन बनाएँ — जो शब्द बोलें, उसमें अर्थ की प्रामाणिकता हो; तभी वह शक्तिशाली होगा।

२. मन्त्र-जप केवल यांत्रिक न हो — जप के साथ-साथ अर्थ-भावना भी हो; तभी जप ‘परम मन्त्र’ की दिशा में बढ़ेगा।

३. साधन और साध्य के भेद को कम करते जाएँ — साधना स्वयं में परिपूर्ण अनुभव है।

४. वाणी के चार स्तरों का परिचय लें — अपनी भाषा और विचार-प्रक्रिया को क्रमशः गहरा बनाने का प्रयास करें।

५. अजपा-भाव की ओर बढ़ें — एक समय के बाद मन्त्र को ‘जपना’ नहीं पड़ता; वह भीतर स्वयं चलने लगता है।

६. ईश्वर और उनकी अभिव्यक्ति में अभेद देखें — शिव और उनके मन्त्र में जो अभेद है, वही सत्य और उसकी भाषा में भी है।

७. मौन को मन्त्र का परम स्वरूप जानें — जब मन्त्र अपनी पूर्णता पर पहुँचता है, तो वह मौन में समाप्त होता है।

८. चेतना की गहराई में उतरें — साधना का उद्देश्य वह चेतना-स्थिति है जहाँ शब्द और अर्थ, जापक और जाप्य — सब एकाकार हों।

उपसंहार

‘परमाय मन्त्राय’ — शिव का यह नाम एक विलक्षण दार्शनिक प्रतिज्ञा है। यह केवल शिव की महिमा का वर्णन नहीं करता; यह भारतीय ज्ञान-परम्परा की उस गहरी अन्तर्दृष्टि को अभिव्यक्त करता है जिसमें ज्ञाता, ज्ञेय और ज्ञान — तीनों एक ही तत्त्व के विभिन्न प्रतीत होने वाले आयाम हैं।

जब हम कहते हैं — ॐ परमाय मन्त्राय नमः — तो यह केवल शिव को प्रणाम नहीं है। यह उस सत्य को स्वीकार करना है जिसमें हमारी अपनी वाणी, हमारा अपना चिन्तन और हमारी अपनी चेतना — सब शिव-तत्त्व से अभिन्न हैं। परम मन्त्र की खोज बाहर नहीं होती। वह उस आन्तरिक मौन में होती है जो प्रत्येक जप के बाद शेष रहती है।

जिस दिन साधक यह जान लेता है कि वह मन्त्र जप रहा है जिसे, वह स्वयं उसी का विस्तार है — उस दिन मन्त्र ‘परम’ हो जाता है। और तभी शिव की ‘परम मन्त्र’ संज्ञा का वास्तविक अर्थ प्रकट होता है।

लेखककृत श्लोक

हिन्दी भावार्थ : परम मन्त्र, परम ब्रह्म, परम ज्योति और परम शिव — ये एक ही हैं। जहाँ वाक् है, वहाँ उसका मूल मौन है; और जहाँ मौन है, वहाँ ‘ॐ’ है।

(यह श्लोक लेखक द्वारा विवेचन-क्रम में रचा गया है; यह किसी प्राचीन शास्त्र का उद्धरण नहीं है।)

अस्वीकरण (Disclaimer)
यह लेख वेद, उपनिषद्, महाभारत, पुराण, आगम, तन्त्र, पारम्परिक भाष्यों तथा उपलब्ध शोध-सामग्रियों के अध्ययन पर आधारित है। प्रस्तुत विवेचन अध्ययन, चिन्तन और संवाद की दृष्टि से किया गया है तथा इसे किसी एक सम्प्रदाय, संस्था या विद्वान की अंतिम अथवा आधिकारिक व्याख्या न माना जाए। जहाँ प्रत्यक्ष शास्त्रीय प्रमाण उपलब्ध हैं, वहाँ उन्हें यथासम्भव प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है; अन्यत्र पारम्परिक एवं दार्शनिक व्याख्याओं का उपयोग किया गया है। यदि किसी उद्धरण, पाठभेद, अनुवाद या व्याख्या में अनजाने में कोई त्रुटि रह गई हो, तो विद्वानों एवं पाठकों के सुझावों का सादर स्वागत है।