शिव-सहस्रनाम के ‘दिग्वासस्’ नाम की व्युत्पत्ति, शास्त्रीय प्रमाण, पौराणिक प्रसंग, मनोवैज्ञानिक अर्थ, दार्शनिक विश्लेषण तथा आधुनिक जीवन में इसकी प्रासंगिकता पर आधारित शोधपरक हिन्दी भाष्य।
१. प्रस्तावना
वस्त्र मनुष्य की सभ्यता का प्रतीक है। वस्त्र पहनना अर्थात् समाज में प्रवेश करना, मर्यादा स्वीकार करना, सीमाओं को अपनाना। और वस्त्र का त्याग? — वह या तो पतन है, या फिर उस अवस्था का संकेत जो सभ्यता से परे है, मर्यादा से परे है, सीमाओं से परे है।
शिव दिग्वासस् हैं — जिनका वस्त्र दिशाएँ हैं। अर्थात् वे न तो नग्न हैं और न वस्त्र-धारी — वे उस अवस्था में हैं जहाँ दिशाएँ ही आवरण हैं। आकाश ही परिधान है। यह एक अत्यन्त साहसी और बहुस्तरीय प्रतीक है।
इस नाम का केन्द्र न केवल भाषावैज्ञानिक है, न केवल पौराणिक — यह मूलतः दार्शनिक और प्रतीकात्मक है। यह नाम पूछता है : जब परम सत्ता के लिए कोई आवरण सम्भव नहीं, तो उसका वस्त्र क्या है? और जब अनन्त दिशाएँ ही वस्त्र हों, तो उसका अर्थ क्या है?
यही इस अध्याय की खोज है।
२. नाम की व्युत्पत्ति एवं शब्द-विज्ञान
धातु-विचार एवं पद-विश्लेषण
दिग्वासस् = दिक् + वासस्
दिक् (दिश् का सन्धि-रूप) :
- मूल शब्द दिश् — दिशा, क्षितिज, आकाश-प्रसार।
- √दिश् धातु से — दिखाना, संकेत करना, निर्देश करना।
- दिशाएँ दस मानी जाती हैं — चार मुख्य (पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण), चार विदिशाएँ (ईशान, आग्नेय, नैऋत्य, वायव्य), और दो अतिरिक्त (ऊर्ध्व = ऊपर, अधः = नीचे)।
- दिशाएँ असीम हैं — उनका कोई अन्त नहीं। इसीलिए दिशाओं को वस्त्र मानना अनन्तता को आवरण मानना है।
वासस् (नपुंसकलिङ्ग) :
- √वस् (आच्छादन करना, निवास करना) + असुन् प्रत्यय।
- अर्थ : वस्त्र, आवरण, परिधान।
- वासस् और वसन — दोनों इसी धातु से।
समास-विग्रह
बहुव्रीहि समास : दिशः एव वासः यस्य सः = दिग्वासाः
“जिनका वस्त्र दिशाएँ हैं” — अर्थात् जो दिशाओं के समान व्यापक हैं, जिन्हें कोई वस्त्र आवश्यक नहीं क्योंकि वे स्वयं सर्वव्यापी हैं।
चतुर्थी एकवचन : दिग्वाससे (नमः के साथ)।
वैकल्पिक व्युत्पत्तियाँ एवं अर्थ-विस्तार
कुछ टीकाकार दिग्वासस् को इस प्रकार भी विग्रहित करते हैं :
दिक् + √वस् (निवास करना) — “जो दिशाओं में निवास करते हैं।” इस अर्थ में शिव सर्वदिक्-व्यापी हैं — प्रत्येक दिशा में उनका वास है।
दिक् = ज्ञान-क्षेत्र — आगमिक व्याख्याओं में दिक् को ज्ञान-विस्तार का प्रतीक माना गया है। इस अर्थ में दिग्वासस् = “जिनका आवरण ज्ञान की असीमितता है।”
निरुक्तीय अर्थ
निरुक्त-परम्परा में दिश् का सम्बन्ध देश (स्थान) और दर्शन (दिखाना) से है। दिशाएँ देश को परिभाषित करती हैं — किन्तु स्वयं अपरिभाषित रहती हैं। दिग्वासस् शिव इसीलिए परिभाषा-अतीत हैं — जो सबको दिशा दिखाते हैं, स्वयं किसी दिशा में सीमित नहीं।
३. शास्त्रीय आधार
वैदिक साक्ष्य
दिगम्बर कहा गया है :
“दिशः शिरः” — “दिशाएँ (ब्रह्म का) शिर हैं।”
यहाँ दिशाओं को ब्रह्म के अंग के रूप में देखा गया है। दिग्वासस् शिव इसी कल्पना के विस्तार हैं — दिशाएँ उनका अंग हैं, वस्त्र हैं।
श्वेताश्वतर उपनिषद् (६.१३) में कहा गया है :
“ नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानामेको बहूनां यो विदधाति कामान्। तत्कारणं साङ्ख्ययोगाधिगम्यं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः॥ “
— “जो एक होते हुए बहुतों की कामनाएँ पूर्ण करता है।” यह एकत्व में बहुत्व — और बहुत्व में एकत्व — ही दिग्वासस् का दार्शनिक सार है : दिशाएँ अनेक हैं, किन्तु जो उन्हें वस्त्र की भाँति धारण करता है वह एक है।
पौराणिक साक्ष्य
शिवपुराण (कोटिरुद्रसंहिता) में शिव के दिगम्बर स्वरूप का वर्णन मिलता है। दिगम्बर और दिग्वासस् — दोनों एक ही तथ्य को दो कोणों से देखते हैं। दिगम्बर का अर्थ है “जिनका अम्बर (आकाश/वस्त्र) दिशाएँ हैं” — और दिग्वासस् का अर्थ है “जिनका वासस् (वस्त्र) दिशाएँ हैं।” दोनों पर्यायवाची हैं।
लिङ्गपुराण (पूर्वभाग) में शिव के दिगम्बर रूप की व्याख्या करते हुए कहा गया है कि यह रूप उनकी निरावरणता और सर्वव्यापकता का प्रतीक है — वे किसी वस्त्र से आवृत नहीं क्योंकि कोई वस्तु उन्हें आवृत करने में समर्थ नहीं।
स्कन्दपुराण में दिग्वासस् की व्याख्या करते हुए कहा गया है कि शिव के नग्न स्वरूप को अशोभन नहीं समझना चाहिए — वह परम शुद्धता का प्रतीक है, जहाँ कोई आवरण, कोई छिपाव, कोई व्यवधान नहीं।
महाभारत के अनुशासनपर्व में शिव के दिगम्बर स्वरूप का उल्लेख है — और यह स्वरूप योगी-शिव का है, जो सांसारिक मर्यादाओं से अतीत हैं।
आगम एवं तन्त्र-साक्ष्य
विज्ञानभैरव में नग्नता और आवरण-रहितता की साधना का उल्लेख है — यह आवरण केवल वस्त्र का नहीं, मन के आवरणों का भी है। दिग्वासस् शिव उस अवस्था के प्रतीक हैं जहाँ चेतना पर कोई आवरण नहीं — न अज्ञान का, न संस्कार का, न अहंकार का।
४. पौराणिक प्रसंग
दक्ष-यज्ञ और दिग्वासस् शिव (आधुनिक/लेखकीय व्याख्या)
शिवपुराण के सती-खण्ड में दक्ष के यज्ञ में शिव को अनिमन्त्रित किया गया — एक कारण यह भी था कि शिव दिगम्बर हैं, श्मशान-वासी हैं, सामाजिक मर्यादाओं से बाहर हैं। दक्ष की दृष्टि में यह असभ्यता थी।
यह प्रसंग दिग्वासस् नाम की एक महत्त्वपूर्ण सांस्कृतिक व्याख्या प्रस्तुत करता है — शिव सामाजिक परिभाषाओं से परे हैं। उनकी दिग्वासस्-अवस्था समाज को असुविधाजनक लगती है — क्योंकि वे उस मर्यादा का उल्लंघन करते हैं जो मनुष्य ने परमात्मा पर भी आरोपित करने का प्रयास किया है।
भैरव-रूप और दिग्वासस् (भक्तिपरक/लोक-परम्परा)
भैरव शिव का वह रूप है जो नियम-अतीत, भय-उत्पादक और अनावृत है। अष्टभैरव परम्परा में दिगम्बर भैरव का विशेष स्थान है। यह रूप तन्त्र-साधना में आवरण-विसर्जन का प्रतीक है।
नाथ-परम्परा और अवधूत (व्याख्यात्मक कड़ी)
गोरक्षनाथ की गोरक्षशतक परम्परा में अवधूत — जो संसार के सभी आवरण त्याग चुका है — दिग्वासस् शिव का मानवीय प्रतिरूप है। नाथ-योगी का नग्न या न्यूनतम वस्त्र धारण करना इसी दार्शनिक स्थिति का प्रकटीकरण है।
५. प्रतीकात्मक एवं मनोवैज्ञानिक अर्थ
वस्त्र : आवरण का बहुस्तरीय प्रतीक
वस्त्र केवल शरीर का आवरण नहीं — यह पहचान, स्थिति, सामाजिक भूमिका का भी आवरण है। राजा वस्त्र से राजा दिखता है; पुजारी वस्त्र से पुजारी। वस्त्र भूमिका को परिभाषित करता है।
शिव दिग्वासस् हैं — इसका अर्थ है कि उन पर कोई भूमिका आरोपित नहीं की जा सकती। वे राजा नहीं, पुजारी नहीं, गृहस्थ नहीं, सन्यासी नहीं — वे सब हैं और कोई नहीं। दिशाओं का वस्त्र = कोई निश्चित भूमिका नहीं।
मनोवैज्ञानिक दृष्टि : Persona का विसर्जन (आधुनिक तुलनात्मक व्याख्या)
जुंगीय मनोविज्ञान में Persona — वह मुखौटा जो हम समाज के लिए धारण करते हैं — वस्त्र का मनोवैज्ञानिक समतुल्य है। दिग्वासस् शिव Persona-रहित हैं — वे वह Self हैं जिसे कोई Persona की आवश्यकता नहीं।
साधना में Persona का विसर्जन एक अनिवार्य चरण है। जब साधक अपनी समस्त भूमिकाओं — पुत्र, पिता, व्यापारी, विद्वान् — को एक-एक करके छोड़ता है, तब वह दिग्वासस्-अवस्था की ओर अग्रसर होता है।
नग्नता : भेद्यता और पारदर्शिता का प्रतीक
नग्नता का एक और प्रतीकात्मक अर्थ है — पारदर्शिता। जिसमें कोई छिपाव नहीं, कोई रहस्य नहीं। दिग्वासस् शिव पूर्ण पारदर्शी हैं — उनका कोई गुप्त एजेण्डा नहीं, कोई छिपी हुई परत नहीं।
यह शुद्धता का उच्चतम स्तर है — जहाँ कोई आवरण नहीं क्योंकि छिपाने को कुछ है ही नहीं।
दिशाएँ : सीमाहीनता का प्रतीक
दिशाएँ सर्वव्यापी हैं — पूर्व-पश्चिम-उत्तर-दक्षिण और ऊर्ध्व-अधः। कोई स्थान ऐसा नहीं जो किसी दिशा में न हो। दिग्वासस् शिव का वस्त्र यदि दिशाएँ हैं, तो वे सर्वत्र व्याप्त हैं — उनकी उपस्थिति में कोई रिक्त स्थान नहीं।
यह सर्वव्यापकता का अत्यन्त काव्यात्मक और दार्शनिक प्रकाशन है।
६. दार्शनिक विवेचन
अद्वैत वेदान्त
शंकर के अद्वैत में ब्रह्म निरुपाधि है — किसी उपाधि (आवरण, विशेषण, सीमा) से रहित। वस्त्र एक उपाधि है — यह पहचान करता है, सीमित करता है। दिग्वासस् शिव = उपाधि-रहित ब्रह्म — जिस पर कोई वस्त्र, कोई सीमा, कोई परिभाषा नहीं।
किन्तु दिशाओं का वस्त्र एक अत्यन्त सूक्ष्म दार्शनिक कथन है — दिशाएँ उपाधि नहीं हैं क्योंकि वे स्वयं असीम हैं। अद्वैत की भाषा में : जिस उपाधि की कोई सीमा न हो, वह उपाधि नहीं — वह स्वरूप है। दिशाएँ असीम हैं, अतः वे वस्त्र नहीं, स्वरूप हैं।
कश्मीर शैवदर्शन
प्रत्यभिज्ञाहृदयम् में कहा गया है कि शिव-चेतना स्वच्छ (पारदर्शी) है — उस पर मल (अशुद्धि का आवरण) नहीं। तीन मल हैं — आणव मल (अहंकार का आवरण), मायीय मल (भेद का आवरण), कार्म मल (कर्म का आवरण)। दिग्वासस् शिव इन तीनों मलों से मुक्त हैं — उनका मल-रहित स्वरूप ही उनकी दिग्वासस्-अवस्था है।(लेखक की व्याख्या)
स्पन्दकारिका में स्वतन्त्र चेतना का वर्णन है — शिव स्वतन्त्र हैं, किसी नियम, किसी आवरण से बद्ध नहीं। दिग्वासस् इसी स्वातन्त्र्य का प्रकाशन है।
योगदर्शन
कैवल्यपाद (योगसूत्र ४) में कैवल्य की अवस्था का वर्णन है — जहाँ चित्त के समस्त आवरण (क्लेश, कर्म, आशय) विलुप्त हो जाते हैं। यह कैवल्य = दिग्वासस्-अवस्था है — जहाँ केवल शुद्ध चेतना शेष रहती है, किसी आवरण के बिना।
अष्टांग योग में प्रत्याहार — इन्द्रियों का विषयों से निवृत्त होना — वस्त्र-त्याग का योगिक समतुल्य है। जैसे वस्त्र शरीर से अलग किया जाता है, वैसे ही इन्द्रियाँ विषयों से अलग की जाती हैं।
पाशुपत दर्शन
पाशुपत सूत्र में अवधूत की अवस्था का वर्णन है — जहाँ साधक लोकापवाद (सामाजिक निन्दा) को भी वस्त्र की भाँति त्याग देता है। यह पाशुपत साधना का एक विशेष चरण है — अपमान में भी अविचलित रहना। दिग्वासस् शिव इस अवस्था के परम आदर्श हैं।
७. प्रतीक एवं प्रतिमा-विज्ञान
दिगम्बर-मूर्ति परम्परा
दिगम्बर शिव की मूर्तियाँ भारतीय मूर्तिकला में प्रचलित हैं — विशेषतः भैरव, नटराज, और लिङ्गोद्भव रूपों में। इन मूर्तियों में नग्नता अश्लीलता नहीं — परम शुद्धता का मूर्तिशास्त्रीय प्रकाशन है।
नटराज मूर्ति में शिव न्यूनतम आभूषणों के साथ नृत्य-मुद्रा में हैं — उनकी मुक्त जटाएँ और व्यापक भुजाएँ दिशाओं को व्याप्त करती हैं। यह दिग्वासस् भाव का मूर्तिशास्त्रीय प्रकाश है।
अर्धनारीश्वर में शिव का आधा भाग दिगम्बर और पार्वती का आधा भाग सवस्त्र — यह दिग्वासस् और सावरण का दार्शनिक सम्मेलन है।
श्मशान और दिग्वासस्
शिव श्मशान-वासी हैं — और श्मशान वह स्थान है जहाँ सब आवरण — शरीर, वस्त्र, पहचान, नाम — सब भस्म हो जाते हैं। दिग्वासस् शिव का श्मशान-वास इसीलिए प्रतीकात्मक रूप से पूर्ण है — जहाँ कोई आवरण शेष नहीं रहता, वहाँ दिग्वासस् की स्थिति स्वाभाविक है।
भस्म और दिग्वासस्
शिव भस्मधारी हैं। भस्म वस्त्र का विकल्प है — किन्तु वह जले हुए अस्तित्व का प्रतीक है। भस्म = अहंकार की राख। जब समस्त उपाधियाँ भस्म हो जाती हैं, तब दिग्वासस्-अवस्था प्रकट होती है।
८. मन्त्र, ध्वनि एवं नाद-विज्ञान (परम्परागत तान्त्रिक शैली)
दिक् की नाद-शक्ति
दिक् शब्द में द और क — दोनों आकाश-तत्त्व से सम्बद्ध माने जाते हैं। दिशा = शब्द-ब्रह्म का विस्तार-क्षेत्र। आकाश में ध्वनि व्याप्त होती है — और दिशाएँ आकाश का विस्तार हैं। दिग्वासस् शिव इसीलिए नाद-ब्रह्म के साथ गहराई से जुड़े हैं।
ॐ दिग्वाससे नमः का जप करते समय दिक् का उच्चारण एक विस्तार-भावना उत्पन्न करता है — मानो चेतना चारों ओर फैल रही हो।
वासस् की ध्वनि-व्याख्या
वासस् में व = वायु-बीज; स = सत्त्व-संकेत। इस दृष्टि से दिग्वासस् = “जिनकी चेतना वायु की भाँति दिशाओं में व्याप्त है।” (यह परम्परागत नाद-व्याख्या है।)
९. ध्यान, उपासना एवं साधना
दिग्वासस् नाम की ध्यान-विधि
यह नाम शाम्भवोपाय और आणवोपाय के सन्धि-बिन्दु पर स्थित है।
प्रथम चरण — खुले आकाश के नीचे बैठें, यदि सम्भव हो। चारों दिशाओं का बोध करें।
द्वितीय चरण — भावना करें : “जो आकाश मुझे चारों ओर से घेरे हुए है — वह शिव का वस्त्र है। मैं शिव के वस्त्र के भीतर हूँ — उनकी उपस्थिति में।”
तृतीय चरण — ॐ दिग्वाससे नमः का मन्द जप करते हुए अनुभव करें कि सीमाएँ — शरीर की, मन की, पहचान की — विस्तृत होती जा रही हैं, जैसे वस्त्र ढीले हो रहे हों।
चतुर्थ चरण — अन्त में निर्विचार अवस्था में रहें — जहाँ कोई आवरण न हो, कोई विचार-वस्त्र न हो।
साधना का मनोवैज्ञानिक प्रभाव
दिग्वासस् नाम की साधना से साधक में भूमिका-आसक्ति (Role-attachment) कम होती है। जो व्यक्ति अपनी सामाजिक भूमिकाओं से अत्यधिक आसक्त है — “मैं अधिकारी हूँ”, “मैं विद्वान् हूँ” — वह दिग्वासस् शिव के ध्यान से क्रमशः उस Persona को शिथिल करना सीखता है।
यह मानसिक लचीलापन (Psychological Flexibility) उत्पन्न करता है — जो आधुनिक मनोविज्ञान में मानसिक स्वास्थ्य का आधार माना जाता है।
१०. आधुनिक जीवन में प्रासंगिकता
आधुनिक मनुष्य अनेक वस्त्रों से लदा हुआ है — पद का वस्त्र, प्रतिष्ठा का वस्त्र, सम्प्रदाय का वस्त्र, राष्ट्रीयता का वस्त्र, विचारधारा का वस्त्र। ये आवरण उसकी मूल पहचान को ढक देते हैं।
दिग्वासस् शिव यह प्रश्न पूछते हैं : इन सब आवरणों के नीचे तुम कौन हो?
यह प्रश्न आत्मज्ञान का प्रारम्भ है। नेतृत्व में यह प्रश्न अहंकार-रहित नेतृत्व (Egoless Leadership) की नींव है। शिक्षा में यह मुक्त चिन्तन का आधार है — जहाँ विद्यार्थी पूर्वग्रहों के वस्त्र उतारकर नया ज्ञान ग्रहण करता है। (आधुनिक अनुप्रयोग)
पारिवारिक सम्बन्धों में — जब हम भूमिकाओं से परे जाकर व्यक्ति को देखते हैं — तब सम्बन्धों में गहराई आती है। दिग्वासस् का यह पाठ सम्बन्धों को प्रामाणिक (Authentic) बनाता है।
११. भारतीय चिन्तन में इस नाम का स्थान
शिव-सहस्रनाम में दिग्वासस् नाम एक अत्यन्त विशिष्ट स्थान रखता है। यह नाम शिव को सामाजिक परिभाषाओं से मुक्त घोषित करता है। अधिकांश देवताओं का एक निश्चित वस्त्र-विधान है — विष्णु पीताम्बर हैं, ब्रह्मा श्वेताम्बर, लक्ष्मी रक्ताम्बर। शिव दिग्वासस् हैं — उनका कोई निश्चित वस्त्र नहीं।
यह नाम-रहितता (Beyond naming) और रूप-रहितता (Beyond form) की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम है। शिव की दिग्वासस्-अवस्था उन्हें सर्वसाधारण बनाती है — वे किसी एक वर्ग, जाति, या परम्परा के देव नहीं। वे सबके हैं क्योंकि वे किसी के नहीं।
यदि दिग्वासस् नाम न होता, तो शिव की सर्वव्यापकता केवल दार्शनिक कथन रहती। यह नाम उस सर्वव्यापकता को एक ठोस प्रतीक देता है — दिशाएँ ही वस्त्र हैं, अर्थात् कोई भी स्थान, कोई भी दिशा शिव-वर्जित नहीं।
१२. जीवनोपयोगी शिक्षाएँ
१. अपनी भूमिकाओं को पहचानो, उनसे मत बंधो — दिग्वासस् शिव सिखाते हैं कि भूमिकाएँ वस्त्र की भाँति हैं — पहनी जाती हैं, उतारी जाती हैं। तुम भूमिका नहीं हो।
२. पारदर्शिता सबसे बड़ा कवच है — जिसमें कोई छिपाव नहीं, उसे भय नहीं। दिग्वासस् शिव की नग्नता उनकी अभेद्यता है।
३. सीमाएँ मनसिक हैं, वास्तविक नहीं — दिशाएँ असीम हैं — और शिव का वस्त्र असीम है। हमारी अधिकांश सीमाएँ स्व-आरोपित मानसिक वस्त्र हैं।
४. प्रकृति ही परम वस्त्र है — खुले आकाश में बैठना, प्रकृति में रहना — यह दिग्वासस् भाव की सरलतम साधना है।
५. पूर्वग्रहों के वस्त्र उतारना ज्ञान की शर्त है — जो पहले से तय करके आता है, वह कुछ नया नहीं सीख सकता। दिग्वासस् मन = खुला मन।
६. सामाजिक स्वीकृति की आवश्यकता से मुक्ति आत्म-शक्ति का प्रमाण है — शिव दिग्वासस् हैं — वे दक्ष की स्वीकृति के लिए वस्त्र नहीं पहनते। जो अपने स्वभाव में स्थित है, उसे बाहरी सम्मति की आवश्यकता नहीं।
७. हर दिशा में शिव की उपस्थिति देखना सर्वोच्च दृष्टि है — यदि दिशाएँ शिव का वस्त्र हैं, तो हर दिशा में शिव हैं। यह सर्वत्र दर्शन की दृष्टि जीवन को भय-मुक्त बनाती है।
८. आवरण उतारना कमज़ोरी नहीं, साहस है — दिग्वासस् की अवस्था बहादुरी की माँग करती है — अपने प्रामाणिक स्वरूप में प्रकट होने का साहस।
१३. उपसंहार
दिग्वासस् — यह नाम एक दार्शनिक विरोधाभास को सुलझाता है। वस्त्र सीमित करता है; किन्तु जब वस्त्र दिशाएँ हों — जो स्वयं असीम हैं — तो सीमा और असीमता एकत्र हो जाती हैं।
शिव दिग्वासस् हैं — इसका अर्थ है कि उनका होना ही उनका आवरण है। उनके अस्तित्व को कोई बाहरी परिभाषा, कोई सामाजिक वस्त्र, कोई वर्गीकरण ढक नहीं सकता। वे उतने ही प्रकट हैं जितने अप्रकट।
साधक के लिए यह नाम एक आमन्त्रण है — अपने वस्त्रों को पहचानो। अहंकार का वस्त्र, पूर्वग्रह का वस्त्र, भय का वस्त्र, सामाजिक भूमिका का वस्त्र — इन्हें एक-एक करके उतारते जाओ। जब सब उतर जाए, तब जो शेष रहे — वही दिग्वासस् शिव का स्वरूप है। और आश्चर्य यह है — वह स्वरूप तुम्हारा अपना स्वरूप भी है।
— लेखककृत श्लोक —
दिशो वासो यस्य देवस्य नास्ति किञ्चित् परावृतम्। सर्वावरणविनिर्मुक्तं तं दिग्वाससमाश्रये॥ यत्र नग्नं न लज्जास्ति यत्र शुद्धं न वस्त्रकम्। तं परं परमेशानं दिग्वाससमहं भजे॥
(जिस देव का कोई भी आवरण नहीं, जो समस्त आच्छादनों से सर्वथा मुक्त हैं — उन दिग्वासस् शिव की मैं शरण लेता हूँ। जहाँ नग्नता में लज्जा नहीं क्योंकि शुद्धता को वस्त्र की आवश्यकता नहीं — उन परम परमेश्वर दिग्वासस् को मैं भजता हूँ।)
एक-पंक्ति सार : दिग्वासस् शिव वह परम सत्ता हैं जिन्हें कोई आवरण — सामाजिक, मानसिक, या अस्तित्वगत — सीमित नहीं कर सकता, क्योंकि असीम दिशाएँ ही उनका परिधान हैं।
अस्वीकरण (Disclaimer)
यह लेख वेद, उपनिषद्, महाभारत, पुराण, आगम, तन्त्र, पारम्परिक भाष्यों तथा उपलब्ध शोध-सामग्रियों के अध्ययन पर आधारित है। प्रस्तुत विवेचन अध्ययन, चिन्तन और संवाद की दृष्टि से किया गया है तथा इसे किसी एक सम्प्रदाय, संस्था या विद्वान की अंतिम अथवा आधिकारिक व्याख्या न माना जाए। जहाँ प्रत्यक्ष शास्त्रीय प्रमाण उपलब्ध हैं, वहाँ उन्हें यथासम्भव प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है; अन्यत्र पारम्परिक एवं दार्शनिक व्याख्याओं का उपयोग किया गया है। यदि किसी उद्धरण, पाठभेद, अनुवाद या व्याख्या में अनजाने में कोई त्रुटि रह गई हो, तो विद्वानों एवं पाठकों के सुझावों का सादर स्वागत है।
