ॐ महात्मने नमः — शिव की असीम आत्म-महत्ता

. प्रस्तावना

शिव-सहस्रनाम में प्रयुक्त प्रत्येक नाम शिव-तत्त्व के किसी एक विशिष्ट आयाम को प्रकाशित करता है, किन्तु कुछ नाम ऐसे भी हैं जो तत्त्व के आकार, विस्तार अथवा गरिमा को ही सीधे शब्दों में व्यक्त करते हैं। महात्मने ऐसा ही एक नाम है। यह नाम किसी विशेष लीला, किसी विशेष आयुध अथवा किसी विशेष रूप का सूचक नहीं है; यह सीधे शिव के स्वरूप की महत्ता और उनकी आत्मा की अपरिमेयता की ओर संकेत करता है। महान् आत्मा जिसकी हो — इस सरल किन्तु गम्भीर अर्थ में एक सम्पूर्ण दार्शनिक दृष्टि निहित है, जो आत्मा की परिमाण-रहित, सीमा-रहित तथा सर्वव्यापी प्रकृति को उद्घाटित करती है।

भारतीय चिन्तन-परम्परा में “महान्” शब्द केवल आकार अथवा परिमाण का वाचक नहीं है; वह गुणात्मक श्रेष्ठता, तात्त्विक गम्भीरता तथा सत्ता की उस अवस्था का द्योतक है जो सीमाओं से परे है। जब यह विशेषण “आत्मन्” के साथ संयुक्त होकर शिव के लिए प्रयुक्त होता है, तो यह केवल स्तुतिपरक अलंकार नहीं रह जाता, अपितु एक तात्त्विक कथन बन जाता है — शिव की आत्मा ही समस्त आत्माओं में महत्तम, समस्त सत्ताओं का आधार तथा समस्त परिमाणों की सीमा है। इस अध्याय में हम इस नाम की व्युत्पत्ति, शास्त्रीय आधार, दार्शनिक निहितार्थ तथा साधना-सम्बद्ध महत्ता का विवेचन करेंगे।

 . नाम की व्युत्पत्ति एवं शब्दविज्ञान

“महात्मने” शब्द “महात्मन्” पद की चतुर्थी विभक्ति, एकवचन का रूप है, जो “नमः” के योग में प्रयुक्त होने पर सम्प्रदान कारक को इंगित करता है (नमः-योगे चतुर्थी) । मूल पद “महात्मन्” एक कर्मधारय समास है, जो दो घटकों से निर्मित है —

धातुविचार एवं समासविग्रह

“महत्” शब्द “मह पूजायाम्” धातु से अथवा भ्वादिगणीय “मह्” (वृद्धौ) धातु से व्युत्पन्न माना जाता है, जिसका मूल अर्थ है वृद्धि, विस्तार अथवा गौरव को प्राप्त होना। इससे बना “महत्” शब्द विशाल, श्रेष्ठ, गुरुतर अथवा गौरवशाली के अर्थ में प्रयुक्त होता है। “आत्मन्” शब्द की व्युत्पत्ति के विषय में वैयाकरणों में कई मत हैं — कुछ इसे अत सातत्यगमने धातु से (निरन्तर गतिशील तत्त्व), कुछ “आप्लोतेः” अथवा “अत्तेः” धातु से व्युत्पन्न मानते हैं। सामान्यतः स्वीकृत अर्थ में “आत्मन्” का तात्पर्य है — वह तत्त्व जो व्याप्त है, जो स्वयं का बोधक है, अर्थात् चेतन स्व-तत्त्व।

समास-विग्रह की दृष्टि से “महात्मन्” एक कर्मधारय समास है — “महान् आत्मा यस्य सः महात्मा” (बहुव्रीहि दृष्टि से) अथवा सरल कर्मधारय रूप में “महान् चासौ आत्मा च महात्मा” — अर्थात् जिसकी आत्मा महान् है, अथवा जो स्वयं महान् आत्मा-स्वरूप है। पाणिनीय व्याकरण की दृष्टि से यह विशेषण-विशेष्य सम्बन्ध वाला समास है, जिसमें “महत्” विशेषण “आत्मन्” विशेष्य की गुणवत्ता को इंगित करता है।

निरुक्तीय अर्थ एवं अर्थविस्तार

निरुक्त की दृष्टि से देखें तो “महात्मा” शब्द भारतीय साहित्य में केवल आध्यात्मिक अर्थ में ही नहीं, अपितु व्यावहारिक भाषा में भी उदात्त चरित्र, विशाल हृदय अथवा असाधारण व्यक्तित्व के व्यक्ति के लिए प्रयुक्त होता रहा है (जैसे भगवद्गीता में “महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः”)। किन्तु जब यह शब्द शिव के सन्दर्भ में प्रयुक्त होता है, तब यह लौकिक अर्थ से ऊपर उठकर पारमार्थिक अर्थ ग्रहण करता है — यहाँ “महत्” का तात्पर्य केवल तुलनात्मक श्रेष्ठता नहीं, अपितु निरपेक्ष, अद्वितीय एवं असीम महत्ता है। शिव के लिए प्रयुक्त होने पर “महात्मा” शब्द उस आत्म-तत्त्व की ओर संकेत करता है जो सांख्य-दर्शन के “महत्तत्त्व” (बुद्धि-तत्त्व, प्रकृति का प्रथम विकार) से भी भिन्न तथा उससे परे है — क्योंकि शिव स्वयं प्रकृति के विकारों से अतीत, शुद्ध चैतन्य-स्वरूप हैं।

 . शास्त्रीय आधार

“महात्मन्” शब्द वैदिक तथा उपनिषदिक साहित्य में सुपरिचित है। श्वेताश्वतर उपनिषद्, जो शैव-वेदान्त की दृष्टि से रुद्र-तत्त्व के प्रतिपादन का प्रमुख उपनिषद् माना जाता है, में परम तत्त्व के महत्त्व एवं आत्म-स्वरूप का वर्णन विभिन्न स्थलों पर हुआ है, यद्यपि “महात्मन्” शब्द का ठीक यही रूप शिव के विशेषण के रूप में प्रत्येक उपनिषद् में समान रूप से नहीं मिलता। भगवद्गीता में “महात्मन्” शब्द बहुशः प्रयुक्त हुआ है, यद्यपि वहाँ यह मुख्यतः भक्तजनों तथा दैवी प्रकृति को आश्रित व्यक्तियों के लिए प्रयुक्त है, स्वयं परमेश्वर के लिए नहीं।

शिव-सहस्रनाम के सन्दर्भ में यह नाम महाभारत के अनुशासन पर्व (शिव-सहस्रनाम-स्तोत्र) तथा शिवपुराण की कोटिरुद्रसंहिता में प्राप्त सहस्रनाम-पाठ की परम्परा का अंग है। इन पाठों में “महात्मने” शिव के उन नामों में सम्मिलित है जो उनके स्वरूप की विशालता, गरिमा तथा अपरिमेयता को व्यक्त करने वाली नाम-श्रृंखला (जैसे महाबल, महारूप, महातेजस्, महाबाहु, महायशस् आदि “महा-” उपसर्गयुक्त नामों की शृंखला) का भाग है। इस विषय में प्रत्यक्ष रूप से यह कहना कि “महात्मने” नाम का कोई पृथक्, विस्तृत पौराणिक आख्यान है, उचित नहीं होगा — इस विशिष्ट नाम हेतु किसी पृथक् कथा का प्रत्यक्ष शास्त्रीय प्रमाण उपलब्ध नहीं है। यह नाम मुख्यतः गुणवाचक स्तुति-नामों की परम्परा में स्थित है, जो शिव के अनन्त, अपरिमेय स्वरूप का बोध कराने हेतु प्रयुक्त हुआ है।

 . पौराणिक प्रसंग

जैसा ऊपर सूचित हुआ, “महात्मने” नाम के लिए कोई पृथक्, सुनिश्चित एवं सुविस्तृत पौराणिक कथा शास्त्रों में उपलब्ध नहीं होती। तथापि शिवपुराण, लिङ्गपुराण तथा स्कन्दपुराण में शिव के “महत्” स्वरूप का सामान्य प्रतिपादन अनेक प्रसंगों में हुआ है — विशेषतः उन आख्यानों में जहाँ शिव अपने भक्तों (जैसे मार्कण्डेय, उपमन्यु अथवा रावण) को अपने विराट, अगोचर एवं अपरिमेय स्वरूप का दर्शन कराते हैं। इन प्रसंगों में शिव का स्वरूप देश, काल तथा परिमाण की सामान्य सीमाओं से परे प्रकट होता है — यही भाव “महात्मन्” विशेषण में संक्षिप्त एवं संहत रूप में निहित है।

लिङ्गोद्भव-कथा, जिसमें ब्रह्मा और विष्णु शिव के अनन्त लिङ्ग-स्वरूप के आदि और अन्त को खोजने में असमर्थ रहते हैं, इस “महत्ता” के भाव का सर्वाधिक प्रत्यक्ष पौराणिक निदर्शन मानी जा सकती है — यद्यपि उस कथा में सीधे “महात्मने” नाम का उल्लेख नहीं मिलता, तथापि उसका तात्पर्यार्थ इसी नाम की भावभूमि से सुसंगत है। इसे हम स्पष्टतः “परम्परागत सांगत्य” [Paramparāgata Vyākhyā] के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं, न कि प्रत्यक्ष शास्त्रीय उद्धरण के रूप में।

 . प्रतीकात्मक एवं मनोवैज्ञानिक अर्थ

मनोवैज्ञानिक दृष्टि से “महात्मने” नाम साधक को एक मूलभूत प्रश्न की ओर ले जाता है — क्या मेरा आत्म-बोध सीमित है अथवा असीम? सामान्य मनुष्य अपनी पहचान को शरीर, विचार, स्मृति तथा सामाजिक भूमिकाओं की सीमाओं में बाँध लेता है। इन सीमाओं के भीतर जो “मैं” निर्मित होता है, वह लघु, भयभीत तथा तुलनाशील होता है। “महात्मा” शिव का बोध साधक को इस लघु-अहं से ऊपर उठाकर उस असीम आत्म-तत्त्व की ओर उन्मुख करता है, जो न तुलनीय है, न सीमित।

यहाँ यह स्मरणीय है कि “महत्ता” का यह बोध अहंकार की वृद्धि से भिन्न है। अहंकार अपनी लघुता को छिपाने हेतु बाह्य विस्तार खोजता है — सम्पत्ति, कीर्ति, अधिकार में; जबकि आत्मा की महत्ता किसी बाह्य उपलब्धि पर आश्रित नहीं, वह स्वतःसिद्ध तथा नित्य है। “महात्मने नमः” का उच्चारण साधक के लिए एक स्मरण है कि जिस महत्ता की खोज वह बाहर कर रहा है, वह उसके भीतर, उसके अपने आत्म-स्वरूप में, शिव-तत्त्व के साथ तादात्म्य में ही निहित है।

 . दार्शनिक विवेचन

अद्वैत वेदान्त की दृष्टि से “महात्मन्” पद ब्रह्म के उस स्वरूप को इंगित करता है जो सत्-चित्-आनन्द रूप में सर्वव्यापी तथा असीम है। शंकराचार्य-परम्परा में आत्मा की महत्ता उसकी अद्वितीयता में निहित मानी गई है — आत्मा महान् इसलिए नहीं कि वह अन्य आत्माओं से बड़ी है, अपितु इसलिए कि वह द्वैत की सीमा से ही परे है, अद्वितीय एवं अखण्ड है। इस दृष्टि से “महात्मने नमः” कहना अद्वैत के उस चरम कथन का ही स्तुतिपरक रूप है, जो कहता है — “एकमेवाद्वितीयम्”।

शैवदर्शन एवं कश्मीर शैवदर्शन की दृष्टि से महत्ता का अर्थ भिन्न किन्तु सम्पूरक है। यहाँ शिव केवल निर्गुण-निष्क्रिय ब्रह्म नहीं, अपितु स्वतन्त्र, स्पन्दनशील तथा जगत् की सृष्टि, स्थिति एवं संहार में सक्रिय परम चैतन्य हैं। कश्मीर शैवदर्शन में शिव की “महत्ता” उनकी स्वातन्त्र्य-शक्ति (पूर्ण स्वतन्त्रता) में निहित मानी जाती है — वे किसी बाह्य कारण से नियन्त्रित नहीं, अपितु स्वयं अपनी इच्छा से जगत् को स्पन्दित करते हैं। इस प्रकार “महात्मा” शिव का अर्थ यहाँ है — वह चैतन्य जिसकी स्वतन्त्रता ही उसकी महानता का आधार है।

योगदर्शन की दृष्टि से महत्ता आत्मा (पुरुष) की उस स्वाभाविक स्थिति से सम्बद्ध है जो प्रकृति के त्रिगुणात्मक विकारों — जिनमें सांख्य-योग का “महत्तत्त्व” (बुद्धि) भी सम्मिलित है — से सर्वथा असंस्पृष्ट रहती है। पुरुष स्वयं महत्तत्त्व से भी परे, द्रष्टामात्र, केवल-स्वरूप है। इस अर्थ में शिव को “महात्मा” कहना यह इंगित करता है कि वे प्रकृति के समस्त विकारों के अतिक्रान्त, शुद्ध पुरुष-तत्त्व अथवा साक्षी-चैतन्य हैं।

भक्ति परम्परा की दृष्टि से “महात्मने नमः” भक्त के लिए एक विनम्र समर्पण-वाक्य है — अपनी लघुता को स्वीकार करते हुए उस असीम महानता के समक्ष नमन करना, जो न केवल शिव के स्वरूप में, अपितु उन सभी साधु-सन्तों में भी प्रतिबिम्बित होती है जिन्हें लोक-व्यवहार में “महात्मा” कहा जाता है — यहाँ एक सूक्ष्म सेतु दिखाई देता है: प्रत्येक सच्चा महात्मा (साधु) वस्तुतः उसी शिव-तत्त्व की महत्ता का प्रतिबिम्ब मात्र माना जाता है।

 . प्रतीक एवं प्रतिमाविज्ञान

“महात्मने” नाम अपने आप में किसी विशिष्ट आयुध, मुद्रा अथवा वाहन का सूचक नहीं है; यह एक गुणवाचक नाम है, इसलिए इसका प्रतिमा-विज्ञान परम्परागत मूर्तिशास्त्र में पृथक् रूप से वर्णित नहीं मिलता। तथापि सांकेतिक दृष्टि से, शिव के उन रूपों में जहाँ उनकी विराटता प्रकट होती है — जैसे महेश्वर अथवा सदाशिव के पंचमुखी, दशभुज स्वरूप, अथवा लिङ्ग के अनन्त, अनादि-अनन्त स्वरूप में — इस नाम की भावाभिव्यक्ति देखी जा सकती है। लिङ्ग-स्वरूप, जो न आदि रखता है न अन्त, “महात्मा” के अपरिमेय भाव का सर्वाधिक उपयुक्त प्रतीक माना जा सकता है।

 . मन्त्र, ध्वनि एवं नादविज्ञान

मूल मन्त्र है — “ॐ महात्मने नमः।” ध्वनि-संरचना की दृष्टि से यह मन्त्र प्रणव “ॐ” से आरम्भ होकर, “महात्मने” पद के माध्यम से विस्तार का भाव धारण करते हुए, “नमः” में समर्पण की भावना के साथ सम्पन्न होता है। “म” वर्ण की आवृत्ति (महा) घोष, गुरुता तथा गम्भीरता का बोध कराती है, जो अर्थ की दृष्टि से भी उपयुक्त है — शब्द की ध्वनि-रचना स्वयं अर्थ के भार को वहन करती प्रतीत होती है। यह मन्त्र शिव-सहस्रनाम-पाठ की परम्परा में अन्य सहस्र नामों के साथ जप किया जाता है; इसके पृथक्, स्वतन्त्र जप की कोई विशिष्ट परम्परा प्रत्यक्षतः शास्त्रों में उल्लिखित नहीं मिलती।

 . ध्यान, उपासना एवं साधना

इस नाम के ध्यान का विषय है — आत्मा की असीमता का बोध। पारम्परिक एवं सुरक्षित साधना-पद्धति में साधक शिव-सहस्रनाम-पाठ के अन्तर्गत इस नाम के उच्चारण के समय अपनी श्वास को दीर्घ एवं स्थिर करते हुए यह चिन्तन कर सकता है कि जो चैतन्य उसके भीतर श्वास ले रहा है, वह किसी सीमा में आबद्ध नहीं। यह ध्यान अहंकार को विगलित करने तथा आत्म-विस्तार के भाव को जाग्रत करने में सहायक माना जाता है। यह विधि तनाव अथवा उतावलेपन से मुक्त, धैर्यपूर्ण अभ्यास की अपेक्षा रखती है; किसी अतिरंजित अथवा असुरक्षित साधना-प्रविधि का यहाँ कोई स्थान नहीं है।

 १०. आधुनिक जीवन में प्रासंगिकता

आधुनिक जीवन में मनुष्य प्रायः अपने को परिस्थितियों, असफलताओं तथा सीमाओं के आधार पर परिभाषित कर लेता है। “महात्मने” का बोध इस प्रवृत्ति के विरुद्ध एक सन्तुलक तत्त्व है — यह स्मरण कराता है कि व्यक्ति का वास्तविक स्वरूप उसकी परिस्थितिजन्य लघुताओं से कहीं अधिक विशाल है। नेतृत्व के क्षेत्र में यह भाव उस व्यापक दृष्टि को जन्म देता है जो संकीर्ण स्वार्थ से ऊपर उठकर निर्णय लेने में सक्षम बनाती है। शिक्षा के क्षेत्र में यह विद्यार्थी को स्मरण कराता है कि उसकी क्षमता किसी एक परीक्षा-परिणाम में सीमित नहीं। पारिवारिक तथा सामाजिक जीवन में यह सहिष्णुता, उदारता तथा क्षमाशीलता के गुणों को पोषित करता है, क्योंकि लघु-हृदय व्यक्ति ही तुच्छ बातों में उलझता है, जबकि “महत्” हृदय क्षमा एवं सामंजस्य को सहज रूप से अपनाता है।

 ११. भारतीय चिन्तन में इस नाम का स्थान

शिव के अन्य नामों की तुलना में “महात्मने” की विशिष्टता इस बात में है कि यह किसी क्रिया, गुण अथवा रूप-विशेष का वर्णन नहीं करता, अपितु सीधे स्वरूप के परिमाण एवं गरिमा की घोषणा करता है। “महाबल”, “महातेजस्”, “महारूप” आदि नाम शक्ति, तेज अथवा रूप की महत्ता को इंगित करते हैं, जबकि “महात्मन्” इन सबके मूल आधार — आत्म-तत्त्व — की महत्ता को इंगित करता है। यदि इस नाम को शिव की अवधारणा से हटा दिया जाए, तो शिव के अन्य समस्त गुणों (बल, तेज, रूप, ज्ञान) का आधारभूत, समेकित स्वरूप अनुल्लिखित रह जाएगा — क्योंकि ये सभी गुण अन्ततः उसी “महान् आत्मा” के विभिन्न प्रकाशन-रूप हैं। इस प्रकार यह नाम सहस्रनाम की सम्पूर्ण संरचना में एक आधारभूत, संयोजक कड़ी का कार्य करता है।

 १२. जीवनोपयोगी शिक्षाएँ

“महात्मने नमः” नाम का सबसे गहन जीवनोपयोगी सन्देश यह है कि सच्ची महानता बाह्य उपलब्धियों, सामाजिक मान्यता अथवा तुलनात्मक श्रेष्ठता पर आश्रित नहीं होती, अपितु आत्म-स्वरूप की उस मौलिक विशालता के बोध पर आधारित होती है जो प्रत्येक चेतन प्राणी में अन्तर्निहित है। आधुनिक समाज में व्यक्ति प्रायः महानता को बाह्य मापदण्डों से — पद, धन, प्रसिद्धि अथवा उपलब्धियों की संख्या से — आँकने का अभ्यस्त हो गया है। यह मापदण्ड सदैव तुलनात्मक तथा अस्थायी होता है, क्योंकि बाह्य जगत् में सदैव कोई-न-कोई ऐसा मिल जाता है जो अधिक सम्पन्न, अधिक प्रसिद्ध अथवा अधिक शक्तिशाली प्रतीत होता है। इस निरन्तर तुलना का परिणाम असन्तोष, ईर्ष्या तथा आत्म-सन्देह के रूप में सामने आता है।

“महात्मने” नाम इस चक्र से मुक्ति का मार्ग सुझाता है। यह सिखाता है कि यदि व्यक्ति अपनी पहचान बाह्य उपलब्धियों के स्थान पर अपने भीतर के मौलिक चेतन-स्वरूप में स्थापित करे, तो तुलना की आवश्यकता ही समाप्त हो जाती है — क्योंकि आत्मा की महत्ता किसी अन्य से तुलना करने योग्य ही नहीं है, वह स्वतःसिद्ध तथा नित्य है। जो व्यक्ति इस भाव को अपने जीवन में उतारता है, उसके व्यक्तित्व में अनेक सूक्ष्म किन्तु सुदृढ़ परिवर्तन सम्भव हैं। प्रथमतः, उसके भीतर से तुलनाजनित ईर्ष्या तथा हीनभावना का शमन होता है, क्योंकि वह अपनी सार्थकता के लिए बाह्य स्वीकृति पर निर्भर नहीं रहता। द्वितीयतः, उसकी उदारता तथा सहनशीलता में वृद्धि होती है — जिस प्रकार विशाल सागर छोटी नदियों के जल को सहज ही आत्मसात् कर लेता है, उसी प्रकार “महत्” हृदय वाला व्यक्ति दूसरों की त्रुटियों, आलोचनाओं तथा विरोधों को सहजता से पचा लेता है, क्षुब्ध नहीं होता। तृतीयतः, ऐसे व्यक्ति में निर्णय-क्षमता स्थिर एवं दूरदर्शी हो जाती है, क्योंकि उसकी दृष्टि क्षणिक लाभ-हानि से ऊपर उठकर व्यापक हित का विचार कर पाती है। चतुर्थतः, भय तथा असुरक्षा की भावना, जो प्रायः लघु-अहंकार से उत्पन्न होती है, स्वाभाविक रूप से क्षीण होती जाती है, क्योंकि जो स्वयं को असीम मानता है, वह सीमित हानियों से विचलित नहीं होता।

इस प्रकार यह नाम केवल एक स्तुति-पद नहीं, अपितु एक जीवन-दृष्टि है — यह सिखाता है कि वास्तविक विनम्रता और वास्तविक महानता परस्पर विरोधी नहीं, अपितु परस्पर पूरक हैं। जो व्यक्ति अपने भीतर की असीम आत्म-महत्ता को पहचान लेता है, वही बाह्य जगत् में सच्ची विनम्रता का भी परिचय दे सकता है, क्योंकि उसे अब अपनी लघुता को छिपाने हेतु आडम्बर की आवश्यकता नहीं रहती।

 १३. उपसंहार

“महात्मने नमः” नाम शिव-सहस्रनाम की उस नाम-श्रृंखला का प्रतिनिधि है, जो शिव के स्वरूप को किसी विशेष लीला अथवा आयुध के माध्यम से नहीं, अपितु सीधे उनके आत्म-तत्त्व की असीम गरिमा के माध्यम से प्रकट करती है। व्युत्पत्ति की दृष्टि से यह नाम “महत्” और “आत्मन्” के संयोग से निर्मित है, जो वृद्धि, विस्तार तथा गौरव के भाव को आत्म-तत्त्व के साथ जोड़ता है। दार्शनिक दृष्टि से यह नाम अद्वैत वेदान्त की अद्वितीयता, कश्मीर शैवदर्शन की स्वातन्त्र्य-शक्ति, तथा योगदर्शन की पुरुष-कैवल्य — इन तीनों भूमिकाओं को एक ही शब्द में समाहित करता है। साधना की दृष्टि से यह नाम साधक को अपनी लघुता से ऊपर उठकर आत्मा की असीमता का बोध कराने का साधन है।

यह नाम हमें स्मरण कराता है कि शिव-तत्त्व की समझ तब तक अपूर्ण रहती है, जब तक हम उनके गुणों, लीलाओं तथा रूपों के परे उनके आत्म-स्वरूप की उस मौलिक महत्ता का बोध नहीं करते, जो समस्त गुणों, लीलाओं तथा रूपों का आधार है। आगे के चिन्तन हेतु पाठक इस प्रश्न पर विचार कर सकता है — क्या मेरी अपनी पहचान बाह्य उपलब्धियों में सीमित है, अथवा मैं भी उसी असीम आत्म-तत्त्व की एक किरण हूँ, जिसे शिव-सहस्रनाम “महात्मा” कहकर नमन करता है?

लेखककृत श्लोक:

रूपमात्रं बलं तेजो, महत्त्वमात्मन् इति यस्य नाम।

असीमबोधं हृदि यः स्मरेत् सः, प्राप्नोति शान्तिं शिवमात्मरूपाम्॥

(यह श्लोक लेखक द्वारा इस अध्याय के सार-संक्षेप हेतु रचित है, यह किसी शास्त्रीय ग्रन्थ से उद्धृत नहीं है।)

अस्वीकरण (Disclaimer): यह लेख वेद, उपनिषद्, महाभारत, पुराण, आगम, तन्त्र, पारम्परिक भाष्यों तथा उपलब्ध शोध-सामग्रियों के अध्ययन पर आधारित है। प्रस्तुत विवेचन अध्ययन, चिन्तन और संवाद की दृष्टि से किया गया है तथा इसे किसी एक सम्प्रदाय, संस्था या विद्वान की अंतिम अथवा आधिकारिक व्याख्या न माना जाए। जहाँ प्रत्यक्ष शास्त्रीय प्रमाण उपलब्ध हैं, वहाँ उन्हें यथासम्भव प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है; अन्यत्र पारम्परिक एवं दार्शनिक व्याख्याओं का उपयोग किया गया है। यदि किसी उद्धरण, पाठभेद, अनुवाद या व्याख्या में अनजाने में कोई त्रुटि रह गई हो, तो विद्वानों एवं पाठकों के सुझावों का सादर स्वागत है।