गजचर्मोत्तरीयाय: भगवान शिव हाथी की खाल क्यों धारण करते हैं?

ॐ नमः शिवाय

शिव-सहस्रनाम — नाम-व्याख्या-ग्रन्थ

ॐ गजचर्मोत्तरीयाय नमः

(गज-चर्म को उत्तरीय के रूप में धारण करने वाले)

भाव-गुण श्रेणी : अलंकरण, संहार-लीला एवं चर्म-वस्त्र-स्वरूप

१. प्रस्तावना

शिव-सहस्रनाम में कुछ नाम शिव के तत्त्व-स्वरूप को व्यक्त करते हैं, तो कुछ नाम उनकी किसी विशिष्ट लीला की स्मृति को शब्द में सुरक्षित रखते हैं। “गजचर्मोत्तरीयाय” ऐसा ही एक नाम है — यह किसी अमूर्त गुण का वर्णन नहीं, अपितु एक सुनिश्चित घटना, एक मूर्त दृश्य का सूचक है: शिव, जिन्होंने गज-रूपधारी असुर का संहार कर उसके चर्म को अपने उत्तरीय (कन्धे पर डाले जाने वाले उपरी वस्त्र) के रूप में धारण किया।

इस नाम की भाव-गुण श्रेणी है — अलंकरण, संहार-लीला एवं चर्म-वस्त्र-स्वरूप। पूर्व अध्याय में हमने “भर्गाय” नाम के माध्यम से भस्म एवं व्याघ्रचर्म के प्रतीकों पर विचार किया था; प्रस्तुत नाम उसी प्रतीक-शृंखला का विस्तार है, किन्तु भिन्न सन्दर्भ में — यहाँ वस्त्र किसी अमूर्त तप का परिणाम नहीं, अपितु एक निश्चित संहार-लीला का साक्ष्य है। इस अन्तर को समझना इस अध्याय की कुंजी है।

पाठक के लिए प्रारम्भिक चिन्तन-बिन्दु यह हो सकता है: जब कोई बल, चाहे वह कितना ही विशाल एवं विध्वंसकारी क्यों न हो, परास्त होकर देवत्व द्वारा धारण कर लिया जाता है, तो उसका स्वरूप ही बदल जाता है — भय की वस्तु अलंकार बन जाती है। गजचर्मोत्तरीय यही रूपान्तरण अपने भीतर धारण किए हुए है।

२. नाम की व्युत्पत्ति एवं शब्द-विज्ञान

“गजचर्मोत्तरीयाय” शब्द तीन घटकों से निर्मित है — गज (हाथी), चर्म (खाल, त्वचा), एवं उत्तरीय (शरीर के ऊपरी भाग पर, प्रायः बाएँ कन्धे पर, डाला जाने वाला वस्त्र, जो यज्ञोपवीत के साथ धारण किए जाने वाले उपवस्त्र की भी संज्ञा है)।

समास-विग्रह इस प्रकार सम्भव है: गजस्य चर्म = गजचर्म (षष्ठी-तत्पुरुष समास, अर्थात् “हाथी की खाल”)। तदनन्तर “गजचर्म उत्तरीयं यस्य सः” — अर्थात् “जिसका उत्तरीय-वस्त्र गजचर्म है, वह” — इस प्रकार बहुव्रीहि समास से “गजचर्मोत्तरीय” शब्द सिद्ध होता है, और इसमें चतुर्थी विभक्ति “नमः” के साथ संयुक्त होकर “गजचर्मोत्तरीयाय नमः” रूप बनता है।

यहाँ ध्यातव्य है कि उत्तरीय शब्द का चयन आकस्मिक नहीं है। यदि केवल “वस्त्र” अथवा “आवरण” कहा जाता, तो अर्थ सामान्य रहता; किन्तु “उत्तरीय” विशेष रूप से उस वस्त्र को इंगित करता है जो ब्राह्मणोचित आचार में यज्ञोपवीत-सहचरित, सम्मान एवं औपचारिकता का सूचक माना जाता है। इस प्रकार गजचर्म को उत्तरीय कहना — भयकारी असुर-चर्म को सहज ही उस स्थान पर प्रतिष्ठित कर देना है, जहाँ सामान्यतः शुभ, सात्त्विक वस्त्र धारण किया जाता है। यह शब्द-चयन स्वयं ही इस नाम के मूल तात्पर्य — भय का मांगल्य में रूपान्तरण — को प्रकट करता है।

३. शास्त्रीय आधार

इस अध्याय हेतु उपलब्ध शिव-सहस्रनाम के मुद्रित संस्करण (पद्मपुराण-उत्तरखण्ड, शंकर-संहिता पर आधारित प्रति) में “गजचर्मोत्तरीयाय” नाम की स्पष्ट, असंदिग्ध श्लोक-स्थिति का प्रत्यक्ष सत्यापन इस लेखन के समय सम्भव नहीं हो सका। अतः प्रामाणिकता-नीति के अनुरूप यह स्पष्ट कहना आवश्यक है: इस विशिष्ट मुद्रित संस्करण में इस नाम हेतु प्रत्यक्ष शास्त्रीय प्रमाण इस समय उपलब्ध नहीं है।

तथापि इस नाम का आधार — गज-रूपधारी असुर का संहार एवं उसके चर्म का धारण — भारतीय शैव पुराण-परम्परा में सुपरिचित है। शिवपुराण तथा स्कन्दपुराण की शैव-कथा-परम्परा में गजासुर-संहार का प्रसंग वर्णित है, जिसमें शिव गजरूपधारी असुर का वध कर उसकी खाल को उत्तरीय के रूप में धारण करते हैं। इसके समानान्तर, इसी भाव को व्यक्त करने वाला एक सुप्रसिद्ध, सुस्थापित शिव-नाम है — “कृत्तिवासस्” (अथवा कृत्तिवासा), जिसका अर्थ ही है “चर्म को वस्त्र के रूप में धारण करने वाला”। यह नाम इतना प्रतिष्ठित है कि काशी में “कृत्तिवासेश्वर” नाम से शिवलिंग की स्वतन्त्र उपासना-परम्परा भी प्रचलित है। शिल्पशास्त्र एवं आगम-ग्रन्थों (यथा अंशुमद्भेदागम, कारणागम) की परम्परा में गजासुर-संहार को शिव की पच्चीस लीला-मूर्तियों में से एक — “गजासुरसंहारमूर्ति” — के रूप में मान्यता प्राप्त है, जिसका विस्तृत वर्णन दाक्षिणात्य मन्दिर-शिल्प एवं भारतीय प्रतिमाविज्ञान के आधुनिक अध्ययनों (यथा टी.ए. गोपीनाथ राव कृत “एलिमेंट्स ऑफ हिन्दू आइकनोग्राफी”) में उपलब्ध है। इस विषय में विशिष्ट पुराण-अध्याय अथवा श्लोक-संख्या का उल्लेख यहाँ जानबूझकर नहीं किया जा रहा, क्योंकि उपलब्ध सामग्री से उसका सटीक सत्यापन सम्भव नहीं हो सका; पाठक को यह भेद — सामान्य परम्परा-स्वीकृति और श्लोक-स्तरीय प्रमाण — सदैव स्मरण रखना चाहिए।

४. पौराणिक प्रसंग

गजासुर-संहार की कथा शैव पुराण-परम्परा में इस प्रकार प्रचलित है: एक असुर ने गज (हाथी) का रूप धारण किया अथवा गजरूप में जन्म लिया, और अपने बल के मद में देवताओं, ऋषियों अथवा शिव के गणों के लिए संकट उत्पन्न किया। शिव ने उसका संहार किया, और संहार के पश्चात् उसकी विशाल खाल को अपने कन्धे पर, उत्तरीय के रूप में धारण कर लिया। इसी मुद्रा में शिव का नृत्य-रूप भी अत्यन्त प्रसिद्ध है, जिसमें गजचर्म को दोनों भुजाओं के ऊपर, विजय-ध्वज के समान फैलाए हुए शिव आनन्द-तांडव करते दिखाए जाते हैं — इस प्रतिमा-रूप को शिल्पशास्त्रीय परम्परा में पृथक् रूप से “गजासुरसंहारमूर्ति” कहा गया है।

यहाँ यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि पुराण-भिन्नता के कारण इस कथा के विवरण में भेद पाया जाता है — कहीं गजासुर को स्वतन्त्र असुर कहा गया है, तो कहीं इसे अन्धकासुर-प्रसंग की सहवर्ती घटना अथवा अन्य असुर-युद्धों से सम्बद्ध माना गया है। इन भिन्नताओं का समाधान करना अथवा किसी एक पाठ को अन्तिम प्रमाण घोषित करना इस लेखन के अधिकार-क्षेत्र से बाहर है; यहाँ केवल इतना निवेदन उचित है कि गजासुर-संहार एवं चर्म-धारण की मूल घटना शैव परम्परा में सुस्थापित है, भले ही उसके विस्तृत विवरण में पाठ-भेद विद्यमान हों।

५. प्रतीकात्मक एवं मनोवैज्ञानिक अर्थ

गज भारतीय प्रतीक-परम्परा में विशाल शारीरिक बल, स्थूल स्मृति एवं दुर्दम्य मद (गजमद) का प्रतिनिधित्व करता है। हाथी को वश में करना अत्यन्त कठिन माना गया है, क्योंकि उसका बल स्पष्टतः प्रत्यक्ष, असंदिग्ध है — यह किसी सूक्ष्म, छिपे हुए शत्रु का बल नहीं, अपितु खुले रूप में प्रकट, स्थूल सामर्थ्य है। गजासुर का संहार, अतः, उस मनोवैज्ञानिक सत्य का प्रतीक बनता है जिसमें साधक को अपने भीतर के सबसे प्रत्यक्ष, सबसे प्रबल, सबसे मुखर अहंकार-मद का सामना करना पड़ता है — वह अहंकार जो छिपा नहीं, अपितु स्पष्ट रूप से जीवन को संचालित कर रहा होता है।

इस मद के परास्त होने के पश्चात् जो अवशेष रहता है — चर्म — वह भी सार्थक है। चर्म शरीर का सबसे बाह्य आवरण है, वह सीमा-रेखा जो “मैं” और “जगत्” को पृथक् करती प्रतीत होती है। जिस अहंकार-मद ने कभी साधक को भयभीत किया था, उसी के बाह्य आवरण को अन्ततः वस्त्र के रूप में, आत्म-भाग के रूप में अपनाना — यह दर्शाता है कि परास्त शत्रु अन्ततः स्वयं का ही अंग बन जाता है। यह मनोविज्ञान की उस प्रौढ़ अन्तर्दृष्टि के समतुल्य है जिसमें व्यक्ति अपने दमित, अस्वीकृत अंशों को शत्रु मानकर सतत युद्धरत रहने के स्थान पर, उन्हें पहचानकर, परास्त कर, अन्ततः आत्मसात् कर लेता है।

६. दार्शनिक विवेचन

शैवदर्शन की दृष्टि से यह नाम पञ्चकृत्यों में से संहार-कृत्य का प्रत्यक्ष निदर्शन है। किन्तु ध्यातव्य है कि यहाँ संहार अन्तिम बिन्दु नहीं है — संहार के उपरान्त धारण की क्रिया होती है, अर्थात् विनाश स्वयं में सम्पूर्ण नहीं, वह आगे के सृजनात्मक कर्म (अलंकरण, नृत्य) की पूर्वपीठिका मात्र है। यही शैव चिन्तन की विशेषता है — विनाश को स्वतन्त्र, अन्तिम घटना के रूप में नहीं, अपितु सतत सृजन-चक्र के एक आवश्यक चरण के रूप में देखा जाता है।

योगदर्शन की दृष्टि से गजासुर को इन्द्रिय-बल तथा प्राणिक ऊर्जा के उस विशाल, अनियन्त्रित प्रवाह के प्रतीक रूप में देखा जा सकता है, जिसे साधना द्वारा वश में कर, तदनन्तर उसी ऊर्जा को साधना-पथ में ही नियोजित कर लिया जाता है — यह हठयोग के उस सिद्धान्त से मेल खाता है जिसमें प्राणशक्ति को नष्ट नहीं, अपितु रूपान्तरित एवं ऊर्ध्वगामी किया जाता है। भक्ति-परम्परा में यह नाम भक्त को यह आश्वासन देता है कि उसके भीतर के सबसे स्थूल, सबसे प्रत्यक्ष दोष भी — यदि ईश्वर को समर्पित कर दिए जाएँ — अन्ततः अलंकरण में परिणत हो सकते हैं, तिरस्कार की वस्तु बने नहीं रहते।

७. प्रतीक एवं प्रतिमा-विज्ञान

गजासुरसंहारमूर्ति भारतीय शिल्पशास्त्र की एक सुपरिचित एवं सुविकसित प्रतिमा-परम्परा है। इसमें शिव को प्रायः विजय-भाव में, गजचर्म को अपने दोनों हाथों में ऊपर की ओर फैलाए हुए, अथवा पीठ के पीछे ध्वज के समान लहराते हुए दिखाया जाता है। कहीं-कहीं यह रूप शिव के नृत्य-स्वरूप से भी संयुक्त हो जाता है, जहाँ गजचर्म नृत्य की गतिमयता में वस्त्र की भाँति फहराता प्रतीत होता है। दक्षिण भारतीय मन्दिर-शिल्प में यह मूर्ति-रूप विशेष रूप से विकसित हुआ, और इसे शिव के पच्चीस लीला/अनुग्रह-मूर्तियों में गिना जाता है।

इस प्रतिमा में गज का सिर एवं शुण्ड (सूँड़) प्रायः पृथक् दिखाए जाते हैं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि धारण किया गया चर्म किसी सामान्य पशु का नहीं, अपितु विशिष्ट रूप से गज का ही है। यह विस्तृत, भव्य वस्त्र-रूप — छोटे व्याघ्रचर्म की अपेक्षा — शिव के उस स्वरूप को व्यक्त करता है जो केवल तपस्वी-वैरागी नहीं, अपितु विजयी, ऐश्वर्यशाली संहारक भी है। इस प्रकार गजचर्मोत्तरीय एवं व्याघ्रचर्म — दोनों वस्त्र-प्रतीक होते हुए भी भिन्न भावों के वाहक हैं: एक तपस्या-सिद्ध बल का, दूसरा युद्ध-सिद्ध विजय का।

८. मूर्तिशास्त्रीय विशेषताएँ — मन्त्र, ध्वनि एवं नाद-विज्ञान

“गजचर्मोत्तरीयाय नमः” के जप हेतु कोई पृथक्, स्वतन्त्र पारम्परिक मन्त्र-रचना उपलब्ध सामग्री में सिद्ध नहीं होती, और न ही ऐसा कोई मन्त्र यहाँ गढ़ा जा रहा है। साधक इस नाम का जप शिव-सहस्रनाम के पाठ-क्रम में, अन्य नामों के साथ, श्रद्धापूर्वक कर सकता है। अक्षर-गठन की दृष्टि से यह नाम अन्य अनेक शिव-नामों की भाँति संयुक्त, बहु-अक्षरीय पद है, जिसका उच्चारण-प्रवाह स्वयं ही एक विस्तृत, आवरणकारी भाव उत्पन्न करता है — यह ध्वनि-दीर्घता स्वयं उस विशाल गजचर्म के आवरण-भाव के अनुरूप प्रतीत होती है, यद्यपि यह अवलोकन औपचारिक ध्वनि-सिद्धान्त का दावा नहीं करता।

९. ध्यान, उपासना एवं साधना

इस नाम की साधना का केन्द्रीय भाव है — अपने भीतर के सबसे स्थूल, सबसे प्रत्यक्ष अहंकार-मद को पहचानना और उसे बलपूर्वक दबाने के स्थान पर, श्रद्धापूर्वक ईश्वर के प्रति समर्पित करना। परम्परागत एवं सुरक्षित ध्यान-पद्धति यह है कि साधक यह भावना करे कि उसके भीतर जो भी विशाल, प्रत्यक्ष दोष अथवा अहंकार-रूप उपस्थित है, वह शिव के चरणों में समर्पित हो रहा है, और शिव उसे स्वीकार कर, रूपान्तरित कर, अपने ही अलंकरण के रूप में वापस लौटा रहे हैं।

इस ध्यान का मनोवैज्ञानिक लाभ यह है कि साधक अपने स्थूल दोषों से युद्धरत रहने के स्थान पर, उन्हें समर्पण की वस्तु मानने लगता है, जिससे आत्म-संघर्ष की तीव्रता घटती है और आत्म-स्वीकृति की क्षमता बढ़ती है। यह साधना विशेषतः उन साधकों के लिए उपयोगी है जो अपने प्रत्यक्ष, स्पष्ट दुर्गुणों के कारण अत्यधिक आत्म-निन्दा में उलझे रहते हैं।

१०. भारतीय चिन्तन में इस नाम का स्थान

शिव के वस्त्र-सम्बन्धी नामों में व्याघ्रचर्म, गजचर्म एवं दिगम्बर (वस्त्रहीनता) — ये तीनों भिन्न-भिन्न भाव व्यक्त करते हैं। दिगम्बर-भाव पूर्ण वैराग्य, समस्त आवरण के त्याग को दर्शाता है; व्याघ्रचर्म तपस्या-सिद्ध, एकाकी बल को; और गजचर्म सामूहिक, सार्वजनिक विजय के बल को, जो युद्ध अथवा संहार-लीला से अर्जित होता है। यदि सहस्रनाम से गजचर्मोत्तरीय जैसा नाम अनुपस्थित होता, तो शिव के केवल तपस्वी, एकान्तप्रिय स्वरूप का ही बोध होता; यह नाम स्मरण कराता है कि वही शिव, आवश्यकता पड़ने पर, प्रत्यक्ष, विशाल, सार्वजनिक संहार-लीला में भी उतरते हैं, और उस लीला के प्रमाण को गौरवपूर्वक धारण भी करते हैं।

यह नाम “कृत्तिवासस्” के साथ मिलकर शिव के चर्मवस्त्र-सम्बन्धी नामों के एक समूह का निर्माण करता है, जो भारतीय चिन्तन में यह स्थापित करता है कि विजय का चिह्न त्याज्य नहीं, अपितु धारणीय होता है — बशर्ते वह अहंकार की तुष्टि हेतु नहीं, अपितु धर्म-रक्षा हेतु अर्जित हुआ हो।

११. आधुनिक जीवन में प्रासंगिकता

आधुनिक जीवन में व्यक्ति को प्रायः अपने भीतर के अथवा बाह्य जगत् के विशाल, स्पष्ट, प्रत्यक्ष अवरोधों का सामना करना पड़ता है — चाहे वह किसी संस्था के भीतर का सुदृढ़, दुर्दम्य प्रतिरोध हो, अथवा स्वयं के भीतर का गहरा, स्पष्ट अहंकार। गजचर्मोत्तरीय नाम सिखाता है कि ऐसे विशाल अवरोधों से भयभीत होकर पलायन करना आवश्यक नहीं; उनका सामना धैर्यपूर्वक करना और अन्ततः उन्हीं से अर्जित अनुभव को अपनी सामर्थ्य का अंग बना लेना सम्भव है। नेतृत्व में यह उस साहस के रूप में प्रकट होता है जो बड़ी, प्रत्यक्ष चुनौतियों से मुँह नहीं मोड़ता। व्यक्तिगत विकास में यह उस परिपक्वता के रूप में प्रकट होता है जिसमें विजय के पश्चात् भी विनम्रता बनी रहती है, क्योंकि धारण किया गया चर्म सतत यह स्मरण कराता रहता है कि विजय संघर्ष से अर्जित हुई थी, सहज प्राप्त नहीं थी।

१२. जीवनोपयोगी शिक्षाएँ

गजचर्मोत्तरीय नाम मनुष्य के जीवन को जो मूल सिद्धान्त सिखाता है, वह है — विजय को विनम्रता के साथ धारण करने की कला। अधिकांश व्यक्ति या तो अपने संघर्षों को पूर्णतः विस्मृत कर देना चाहते हैं, यह मानते हुए कि विजय के पश्चात् संघर्ष की स्मृति व्यर्थ है, अथवा वे अपनी विजय का अहंकारपूर्ण प्रदर्शन करने लगते हैं। यह नाम इन दोनों अतियों के मध्य एक तीसरा, अधिक प्रौढ़ मार्ग प्रस्तुत करता है — संघर्ष की स्मृति को न तो नकारना, न उसका अहंकारपूर्ण प्रदर्शन करना, अपितु उसे गरिमापूर्वक, कृतज्ञतापूर्वक धारण करना।

यदि कोई व्यक्ति इस भाव को अपने जीवन में उतारे, तो सबसे पहला परिवर्तन उसकी सफलता के प्रति दृष्टि में दिखाई देगा — वह अपनी उपलब्धियों को आकस्मिक सौभाग्य नहीं, अपितु परिश्रम एवं संघर्ष का सार्थक परिणाम मानने लगेगा, जिससे न तो वह अनावश्यक विनम्रता में उपलब्धि को छिपाएगा, न ही अहंकारपूर्ण दर्प में उसका प्रदर्शन करेगा। दूसरा परिवर्तन उसके भय के प्रति दृष्टिकोण में आएगा — जिन बड़ी, स्पष्ट चुनौतियों से वह पहले भयभीत होता था, उन्हें वह अब सम्भावित विकास के अवसर के रूप में देखने लगेगा, यह जानते हुए कि प्रत्येक विशाल चुनौती के परास्त होने पर वह स्वयं ही उसकी सामर्थ्य का अंग बन जाती है। तीसरा परिवर्तन उसके नेतृत्व-कौशल में आएगा — वह अपनी टीम अथवा परिवार के समक्ष स्पष्ट, ठोस उदाहरण प्रस्तुत करने में सक्षम होगा कि विशाल अवरोध भी अन्ततः पार किए जा सकते हैं, और उनका सामना करने का साहस ही आगे के नेतृत्व की नींव बनता है।

इसके साथ ही यह नाम यह भी सिखाता है कि विजय का उचित प्रदर्शन एवं अहंकारपूर्ण दर्प में भेद है। गजचर्म को धारण करना गर्व का प्रदर्शन नहीं, अपितु उस घटना की सत्य-स्वीकृति है जो घटित हुई। जो व्यक्ति इस भेद को समझता है, वह अपनी उपलब्धियों को आत्म-गौरव के साथ स्वीकार करता है, बिना दूसरों को तुच्छ दिखाए; जो नहीं समझता, वह विजय को अहंकार के प्रदर्शन में बदल देता है। यही अन्तर परिपक्व आत्म-सम्मान और आत्मश्लाघा के बीच की वास्तविक रेखा है।

१३. उपसंहार

इस अध्याय में हमने “गजचर्मोत्तरीयाय” नाम को उसकी शाब्दिक संरचना, उसके पौराणिक आधार, उसके प्रतिमाशास्त्रीय विकास तथा उसके दार्शनिक-मनोवैज्ञानिक निहितार्थों में देखने का प्रयत्न किया। यह नाम स्मरण कराता है कि शिव का तत्त्व केवल शान्त, तपस्वी, एकान्तप्रिय नहीं है — वह विशाल, प्रत्यक्ष बल का सामना करने में भी उतना ही सक्षम है, और उस सामने आए बल के प्रमाण को तिरस्कार की नहीं, गौरव की वस्तु बना लेता है।

पाठक के लिए आगे के चिन्तन की दिशा यह हो सकती है: अपने ही जीवन के उन विशाल, स्पष्ट संघर्षों को स्मरण करना जिनसे होकर वह गुजरा है, और यह विचार करना कि क्या उसने उन संघर्षों के प्रमाण को गरिमापूर्वक धारण करना सीखा है, अथवा वह उन्हें भय से छिपाए रखता है।

कवि-हृदय से:

जो बल प्रबल था सामने कभी,

वही बना अब भूषण है।

संघर्ष जिसे जीता जग ने,

वह चर्म हुआ आभूषण है।

विजय न छिपती, न इतराती,

वह गरिमा का दूषण है।

गजचर्मोत्तरीय यही सिखाए —

जीता भय भी अब पूजन है।

अस्वीकरण (Disclaimer) : यह लेख वेद, उपनिषद्, महाभारत, पुराण, आगम, तन्त्र, पारम्परिक भाष्यों तथा उपलब्ध शोध-सामग्रियों के अध्ययन पर आधारित है। प्रस्तुत विवेचन अध्ययन, चिन्तन और संवाद की दृष्टि से किया गया है तथा इसे किसी एक सम्प्रदाय, संस्था या विद्वान की अंतिम अथवा आधिकारिक व्याख्या न माना जाए। जहाँ प्रत्यक्ष शास्त्रीय प्रमाण उपलब्ध हैं, वहाँ उन्हें यथासम्भव प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है; अन्यत्र पारम्परिक एवं दार्शनिक व्याख्याओं का उपयोग किया गया है। यदि किसी उद्धरण, पाठभेद, अनुवाद या व्याख्या में अनजाने में कोई त्रुटि रह गई हो, तो विद्वानों एवं पाठकों के सुझावों का सादर स्वागत है।