न यह ज्वाला केवल दाह है,
न केवल संहार की विभीषिका।
यह तो शिव की वह चेतना है,
जो तम को जलाकर सत्य का प्रभात जगाती है।
जहाँ दाह में द्वेष नहीं,
जहाँ विनाश में विकार नहीं,
वहीं प्रकट होता है
महादेव का दिव्य अग्नि-स्वरूप।
अनन्त ज्योति-स्तम्भ बनकर
जो आदि-अन्त से परे खड़ा है,
जिसकी सीमा न ब्रह्मा जान सके,
न विष्णु ही पा सके उसका छोर।
वही अग्नि अहंकार को भस्म करती है,
पर आत्मा को नहीं;
वह अज्ञान को जलाती है,
पर ज्ञान का सूर्य उदित करती है।
वही ज्वाला तप बनती है,
वही विवेक बनकर प्रकाशित होती है।
वही करुणा का आलोक है,
वही धर्म का तेजस्वी संकल्प।
जीर्ण संस्कारों की लकड़ियाँ
जब जीवन-अग्नि में समर्पित होती हैं,
तभी भस्म से
नव चेतना के कमल खिलते हैं।
क्रोध वहाँ संयम बन जाता है,
दुःख साधना बन जाता है,
विरह वैराग्य बन जाता है,
और अन्त—नव आरम्भ का उत्सव।
स्थिर होकर भी जो गति है,
मौन होकर भी जो नाद है,
अदृश्य होकर भी जो प्रकाश है,
वही शिव की अग्निज्वाला है।
वह न भय की ज्वाला है,
न केवल यज्ञ की पावन लौ;
वह तो सृष्टि और संहार के मध्य
स्थित शाश्वत रूपान्तरण है।
आओ, उसी अग्नि को प्रणाम करें,
जो जलाती नहीं—शुद्ध करती है;
जो छीनती नहीं—जगाती है;
जो मिटाती नहीं—नव जीवन रचती है।
विनाश जहाँ वरदान बने,
दाह जहाँ परिशोधन हो।
वही शिव की अग्निज्वाला है,
वही जीवन का परम बोध हो॥
