ॐ नागहारधृक् नमः – सर्पों की माला धारण करने वाले
भाव-गुण श्रेणी : अलंकरण, भस्म एवं व्याघ्रचर्म स्वरूप
१. प्रस्तावना
शिव-सहस्रनाम में प्रत्येक नाम एक-एक दर्शन-सूत्र है, जो शिव-तत्त्व के किसी विशिष्ट आयाम को उद्घाटित करता है। “नागहारधृक्” नाम इसी शृंखला में शिव के उस स्वरूप का बोध कराता है, जिसमें वे भयंकरतम, विषैले तथा साधारणतः त्याज्य समझे जाने वाले प्राणी—सर्प—को अपने अलंकरण का अंग बना लेते हैं। यह नाम भाव-गुण की दृष्टि से भस्म और व्याघ्रचर्म के साथ उसी वर्ग में रखा गया है, जो शिव के बाह्य वेश-विन्यास को अभिव्यक्त करता है; किन्तु इसकी अन्तर्वस्तु केवल बाह्य शृंगार तक सीमित नहीं है। सर्प जहाँ लोकमानस में भय, विष और मृत्यु का प्रतीक है, वहीं शिव के कण्ठ, भुजा और जटा में वही सर्प अलंकार बनकर सुशोभित होता है। यह रूपान्तरण—भय का भूषण में, विष का शोभा में परिवर्तन—शैव-चिन्तन के उस मूल सिद्धान्त का द्योतक है, जिसके अनुसार परम चेतना के लिए संसार में कुछ भी सर्वथा त्याज्य अथवा असम्पृक्त नहीं है। जो वस्तु जगत के लिए भय का कारण है, वही शिव के लिए आभूषण है—यही इस नाम का प्रवेश-बिन्दु है, और यहीं से पाठक की दृष्टि इस विचार की ओर उन्मुख होती है कि निषेध और स्वीकृति, भय और सौन्दर्य, विष और अमृत—इन प्रतीत होने वाले द्वन्द्वों का अतिक्रमण ही शिवत्व है।

२. नाम की व्युत्पत्ति एवं शब्द-विज्ञान
“नागहारधृक्” शब्द तीन घटकों से निर्मित एक सामासिक पद है : नाग + हार + धृक्।
धातु-विचार —
“नाग” शब्द संस्कृत में मुख्यतः सर्प-विशेष (विशेषतः फणधारी सर्प) के अर्थ में प्रयुक्त होता है। इसकी व्युत्पत्ति के विषय में परम्परा में एकमत नहीं है—कुछ इसे “न गच्छति इति नागः” (जो सीधे पैरों से नहीं चलता, अपितु शरीर से रेंगता है) के रूप में निरुक्त करते हैं, तो कुछ इसे “नग” (पर्वत) से सम्बद्ध पर्वत-निवासी अथवा गुहा-वासी प्राणी के अर्थ में ग्रहण करते हैं। “हार” शब्द हृ धातु (हरणे—ले जाना, धारण करना) से निष्पन्न है और माला अथवा कण्ठाभूषण के अर्थ में रूढ़ है।
समास-विग्रह —
“नागहार” पद प्रथमतः षष्ठी-तत्पुरुष समास है: नागानां हारः = नागहार अर्थात् “सर्पों की माला”। इसके पश्चात् “धृक्” पद इससे जुड़कर उपपद-तत्पुरुष समास बनाता है : नागहारं धरति इति नागहारधृक्।
प्रत्यय-विवेचन —
“धृक्” शब्द धृ धातु (धारणे—धारण करना, धरना) से क्विप् प्रत्यय द्वारा निष्पन्न कृदन्त रूप है। क्विप् प्रत्यय पाणिनीय व्याकरण में उपपद-समास की स्थिति में धातु से सीधे कर्तृवाचक अर्थ में शून्य-प्रत्यय के रूप में प्रयुक्त होता है (जैसे जलधृक्, भारधृक्, विश्वभृत् आदि में देखा जाता है)। इस प्रकार “धृक्” का शाब्दिक अर्थ है “धारण करने वाला”, और सम्पूर्ण पद का अर्थ हुआ—“सर्पों की माला को धारण करने वाला”।
निरुक्तीय अर्थ —
निरुक्त की दृष्टि से यह नाम केवल बाह्य वेश-भूषा का वर्णन नहीं करता, अपितु “धृक्” प्रत्यय में निहित निरन्तर-धारण का भाव यह संकेत करता है कि यह धारण कोई तात्कालिक अथवा आपाती घटना नहीं, बल्कि शिव-स्वरूप का स्थायी, सहज लक्षण है। सर्प शिव के लिए बाहर से लाया गया अलंकार नहीं, अपितु उनके स्वभाव का सहज अंग है।
वैकल्पिक व्युत्पत्तियाँ —
कुछ परम्परागत व्याख्याकारों ने “नाग” को केवल भौतिक सर्प तक सीमित न रखकर इसे “अहंकार-रहित” (न गच्छति, अर्थात् जो अपने स्वभाव-स्थान से विचलित नहीं होता) के रूपकात्मक अर्थ में भी ग्रहण किया है। यह व्याख्या प्रत्यक्ष शास्त्रीय प्रमाण द्वारा पुष्ट नहीं है, अतः इसे लेखकीय/पारम्परिक अटकल के रूप में ही ग्रहण किया जाना चाहिए, शास्त्रीय तथ्य के रूप में नहीं।
अर्थ-विस्तार —
समास की दृष्टि से यह नाम शिव के कई अन्य समानधर्मा नामों से जुड़ता है, जैसे “व्यालधृक्”, “नागभूषणः” तथा “नागयज्ञोपवीतम्” जैसे विशेषण, जो सभी उसी मूल भाव—सर्प का अलंकरणरूप धारण—को विभिन्न कोणों से अभिव्यक्त करते हैं।
३. शास्त्रीय आधार
इस नाम का प्रत्यक्ष शास्त्रीय उल्लेख शिवपुराण की कोटिरुद्र संहिता के पैंतीसवें अध्याय में निहित शिवसहस्रनामस्तोत्र के चौहत्तरवें श्लोक में प्राप्त होता है, जहाँ भगवान विष्णु द्वारा शिव-आराधना के प्रसंग में सूत जी द्वारा वर्णित सहस्रनामों की शृंखला में यह नाम इस प्रकार आता है :
ब्रह्मज्योतिर्वसुधामा महाज्योतिरनुत्तमः ।
मातामहो मातरिश्वा नभस्वान्नागहारधृक् ॥ ७४ ॥
(अर्थात् — ब्रह्म-ज्योति-स्वरूप, वसुधा के आधार, महाज्योति, अनुत्तम, सबके मातामह, मातरिश्वा (वायु-स्वरूप), नभस्वान् (आकाश-व्यापी) तथा नागहार धारण करने वाले।)
महाभारत के अनुशासन पर्व में उपमन्यु द्वारा युधिष्ठिर को सुनाए गए शिवसहस्रनाम-स्तोत्र (जिसे कई परम्पराओं में “मुख्य” अथवा प्राचीनतम संस्करण माना जाता है) में इस ठीक शब्द-रूप में इस नाम की उपस्थिति की पुष्टि प्रस्तुत लेखन के समय उपलब्ध स्रोतों से पूर्णतः नहीं की जा सकी; अतः इस विषय में स्पष्ट रूप से कहा जाना चाहिए कि महाभारत-संस्करण में इसकी प्रत्यक्ष उपस्थिति का सुनिश्चित प्रमाण उपलब्ध नहीं है, यद्यपि शिव के सर्प-अलंकरण का भाव उस संस्करण में भी अन्य नामों (यथा भुजंगेश, व्यालरूप-सूचक नाम) के माध्यम से प्रतिध्वनित होता है।
इससे स्वतन्त्र किन्तु सम्बद्ध प्रमाण के रूप में, शिव के सर्पाभूषित स्वरूप का वर्णन शिवपुराण की विद्येश्वर संहिता एवं वायुपुराण जैसे ग्रन्थों में शिव की सामान्य मूर्ति-वर्णन-परम्परा के अन्तर्गत बारम्बार मिलता है, जहाँ शिव को “व्यालयज्ञोपवीती”, “भुजंगभूषण” अथवा “सर्पकुण्डली” के रूप में चित्रित किया गया है। यह विवरण स्वतन्त्र मूर्तिशास्त्रीय परम्परा से सम्बद्ध है, न कि सीधे सहस्रनाम-पाठ का अंश; अतः दोनों की पृथक् प्रकृति को इस अध्याय में स्पष्ट रखा गया है।
४. पौराणिक प्रसंग

शिव के सर्प-सम्बन्ध की मूल कथाभूमि समुद्र-मन्थन के प्रसंग से जुड़ती है, जहाँ नागराज वासुकि को मन्दराचल के मन्थन-रज्जु के रूप में प्रयुक्त किया गया था। मन्थन से उत्पन्न हलाहल विष के पान के पश्चात् शिव नीलकण्ठ कहलाए; इस कथा-सन्दर्भ में यद्यपि नागहार-धारण का उल्लेख प्रत्यक्षतः नहीं है, तथापि परवर्ती पौराणिक तथा मूर्तिशास्त्रीय परम्परा में वासुकि तथा अन्य नागों (तक्षक, कर्कोटक आदि) को शिव के कृतज्ञ-भक्त के रूप में चित्रित किया गया है, जो विष-पान से उपकृत होकर स्वेच्छा से शिव के अंगों को अपने शरीर से अलंकृत करते हैं।
शिवपुराण एवं अन्य पुराणों में शिव के गण-परिवार तथा उनके वेश-विन्यास का वर्णन करते हुए बताया गया है कि सर्प उनके कण्ठ, भुजा, कटि और जटा में स्थान पाते हैं—यह विवरण सामान्य शैव-प्रतिमा-परम्परा का सुस्थापित अंग है। इस विषय में विशेष रूप से ध्यातव्य है कि विभिन्न पुराणों में इस प्रसंग की कथात्मक विशिष्टताएँ (किस नाग को किस अंग पर स्थान मिला, आदि) भिन्न-भिन्न रूप में वर्णित हैं, और इन सूक्ष्म भिन्नताओं का समग्र, प्रमाणिक संकलन प्रस्तुत लेखन की परिधि से बाहर है; अतः यहाँ केवल उस साझा तथा सुस्थापित भाव को प्रस्तुत किया गया है जो लगभग सभी परम्पराओं में सामान्य रूप से स्वीकृत है—शिव का सर्पों के साथ सहज, भयरहित तथा आत्मीय सम्बन्ध।
५. प्रतीकात्मक एवं मनोवैज्ञानिक अर्थ
सर्प मानव-चेतना के सर्वाधिक प्राचीन तथा सार्वभौमिक भय-प्रतीकों में से एक है। यह मृत्यु, विष, अप्रत्याशित आघात तथा अवचेतन के उन अंशों का प्रतिनिधित्व करता है, जिन्हें साधारण मनुष्य दमित अथवा वर्जित रखना चाहता है। शिव द्वारा इसी सर्प को कण्ठाभूषण के रूप में धारण किया जाना मनोवैज्ञानिक दृष्टि से एक गहन रूपक प्रस्तुत करता है : जिस वस्तु से साधारण चेतना पलायन करती है अथवा जिसका दमन करती है, परिपक्व और पूर्ण चेतना उसी को आत्मसात् कर, उसे अपने अस्तित्व का अलंकार बना लेती है।

यहाँ यह उल्लेखनीय है कि आधुनिक मनोविज्ञान की भाषा में इसे “छाया” (शैडो) के एकीकरण की प्रक्रिया से तुलनीय देखा जा सकता है—अर्थात् व्यक्तित्व के उन भयकारी, अस्वीकृत अंशों को दबाने के स्थान पर उन्हें पहचानकर अपनी समग्रता का सचेत भाग बना लेना। यह तुलना विश्लेषणात्मक है, कोई शास्त्रीय कथन नहीं; इसे केवल आधुनिक पाठक के लिए इस प्राचीन प्रतीक की सुगमता हेतु प्रस्तुत किया गया है।
साधक के अन्तर्मन के स्तर पर यह नाम इस भाव का द्योतक है कि भय और आसक्ति दोनों ही उसी ऊर्जा के रूप हैं, जिसे साधना द्वारा रूपान्तरित किया जा सकता है। जो तत्त्व विष के रूप में प्राणघातक है, वही समुचित ढंग से धारण किए जाने पर आभूषण बन जाता है—यह रूपान्तरण साधना का मूल प्रयोजन ही है।
६. दार्शनिक विवेचन
अद्वैत वेदान्त —
अद्वैत परम्परा में “रज्जु-सर्प न्याय” ज्ञान-मीमांसा का एक आधारभूत दृष्टान्त है, जहाँ अन्धकार में रस्सी को सर्प के रूप में देखे जाने की भ्रान्ति (अध्यास) द्वारा अविद्या के स्वरूप को समझाया जाता है। यह विशेष रूप से चिन्तनीय है कि जिस सर्प को अद्वैत ज्ञान-मीमांसा भ्रम अर्थात् मिथ्या-आरोपण का प्रतीक मानती है, उसी सर्प को शिव—जो साक्षात् ब्रह्म-तत्त्व के प्रतीक हैं—अपने कण्ठ में धारण करते हैं। इस समानान्तरता की एक सम्भावित (किन्तु स्पष्टतः लेखकीय-विश्लेषणात्मक, शास्त्र-प्रमाणित नहीं) व्याख्या यह हो सकती है कि शिव के लिए सर्प अब भ्रम नहीं रह जाता; जो वस्तु अज्ञानी के लिए भय अथवा भ्रान्ति का कारण है, वही ज्ञानी के लिए—जिसने अध्यास को पहचान लिया है—एक सहज, निर्भय आभूषण मात्र रह जाती है।
शैवदर्शन एवं कश्मीर शैवदर्शन —
कश्मीर शैवदर्शन में कुण्डलिनी शक्ति को प्रायः कुण्डलाकार सर्प के रूपक द्वारा वर्णित किया जाता है, जो मूलाधार में सुषुप्त रहती है और साधना द्वारा जाग्रत होकर ऊर्ध्वगमन करती है। इस दृष्टि से शिव का सर्पाभरण-धारण उस अनुभूति का द्योतक माना जा सकता है, जिसमें शक्ति (कुण्डलिनी) शिव-चेतना के साथ सहज, अभिन्न सम्बन्ध में स्थित है—न भयकारी, न दूरस्थ, अपितु स्वयं शिव के अस्तित्व का अलंकाररूप अंग। यह सम्बन्ध अभिनवगुप्त-परम्परा में विवेचित शिव-शक्ति की अभेद्यता के सिद्धान्त से सुसंगत है, यद्यपि इस नाम का इस सिद्धान्त से प्रत्यक्ष ग्रन्थ-प्रमाणित सम्बन्ध यहाँ लेखकीय विश्लेषण के रूप में ही प्रस्तुत किया जा रहा है।
योगदर्शन —
योग-परम्परा में भी कुण्डलिनी-सर्प का रूपक सुपरिचित है; इस नाम को योगदर्शन की दृष्टि से देखा जाए तो यह उस सिद्ध अवस्था का प्रतीक बनता है, जिसमें साधक की समस्त प्राणिक ऊर्जा (जिसे भय अथवा अनियन्त्रित रूप में विषतुल्य माना जा सकता है) अनुशासित होकर आत्म-अलंकरण अर्थात् आत्म-प्रकाश का साधन बन जाती है।
भक्ति परम्परा —
भक्ति-परम्परा में यह नाम शिव की उस करुणा का सूचक माना जाता है, जिसमें वे भयंकरतम, अस्पृश्य समझे जाने वाले प्राणियों को भी अपने समीप स्थान देते हैं—यह भाव शिव की सर्वग्राहकता तथा भक्तवत्सलता का परिचायक है।
७. प्रतीक एवं प्रतिमा-विज्ञान
शिव की मूर्ति एवं चित्र-परम्परा में सर्प कई रूपों में प्रकट होते हैं—कण्ठहार, भुजबन्ध, कटिबन्ध, कर्णकुण्डल तथा जटाजूट में गुम्फित सर्पाकृतियाँ। इन सभी रूपों में सामान्य नाम “व्याल” अथवा “नाग” का प्रयोग होता है, तथा “नागहारधृक्” इनमें से विशेष रूप से कण्ठ पर धारण किए जाने वाले हार-रूप सर्प का सूचक है। शास्त्रीय मूर्तिशास्त्र-परम्परा में वासुकि को प्रायः शिव के कण्ठहार अथवा यज्ञोपवीत (नागयज्ञोपवीत) के रूप में दर्शाया गया है, जो शिव की समता-दृष्टि का प्रतीक है—जिस प्रकार यज्ञोपवीत ब्राह्मण-कर्तव्य का प्रतीक है, उसी प्रकार सर्पयज्ञोपवीत यह दर्शाता है कि शिव के लिए कोई भी प्राणी, चाहे वह कितना ही भयकारी क्यों न माना जाए, अपवित्र अथवा वर्जित नहीं है।
८. मूर्तिशास्त्रीय विशेषताएँ (मन्त्र, ध्वनि एवं नाद-विज्ञान)
“ॐ नागहारधृक् नमः” इस रूप में यह नाम शिवसहस्रनाम के जप-पाठ में अन्य नामों के साथ क्रमशः उच्चरित किया जाता है। सहस्रनाम-पाठ की परम्परा में प्रत्येक नाम को पृथक् स्तोत्र-मन्त्र का स्वरूप नहीं दिया गया है; अपितु सम्पूर्ण सहस्रनाम-स्तोत्र का पाठ ही साधक के लिए विहित उपासना-विधि है। इस नाम के लिए किसी पृथक्, स्वतन्त्र तथा प्रसिद्ध बीज-मन्त्र अथवा पृथक् ध्यान-श्लोक का शास्त्रीय प्रमाण उपलब्ध नहीं है; अतः इस विषय में कोई कल्पित मन्त्र अथवा स्वरचित रहस्यार्थ यहाँ प्रस्तुत नहीं किया जा रहा। ध्वनि-सामान्य दृष्टि से इतना कहा जा सकता है कि “नाग” शब्द के उच्चारण में निहित दीर्घ अनुनासिक ध्वनियाँ (न्, आ, ग्) तथा “धृक्” में स्थित संवृत स्पर्श-ध्वनि, समवेत रूप में, एक दृढ़, स्थिर तथा संयत उच्चारण-लय उत्पन्न करती हैं, जो अर्थ की दृष्टि से भी—भय के तत्त्व का सुदृढ़, अविचलित धारण—सुसंगत प्रतीत होती है। इसे शब्द-ध्वनि-सामान्य अवलोकन के रूप में ही ग्रहण किया जाना चाहिए, किसी विशिष्ट नाद-शास्त्रीय सिद्धान्त के प्रमाण के रूप में नहीं।
९. ध्यान, उपासना एवं साधना
इस नाम के माध्यम से ध्यान का विषय शिव के उस स्वरूप का चिन्तन है, जिसमें वे भयंकर और सौम्य, विषैला और मंगलकारी—इन दोनों ध्रुवों को अपने ही शरीर पर एक साथ धारण करते हैं। साधक के लिए यह ध्यान की दिशा इस प्रकार निर्धारित की जा सकती है : अपने भीतर उन भयों, आशंकाओं अथवा अस्वीकृत भावों को पहचानना, जिन्हें अब तक दमित रखा गया है, और उन्हें बलपूर्वक नष्ट करने के स्थान पर—जिस प्रकार शिव सर्प को नष्ट नहीं करते, अपितु धारण करते हैं—उन्हें सचेत रूप से स्वीकार कर आत्म-अनुशासन का अंग बनाना।
पारम्परिक एवं सुरक्षित साधना-पद्धति की दृष्टि से, शिवसहस्रनाम के समग्र पाठ में इस नाम के उच्चारण-क्षण में साधक शिव के कण्ठ-प्रदेश में सर्प-अलंकार का ध्यान करते हुए यह भावना कर सकता है कि जो कुछ भी जीवन में भयकारी अथवा अस्वीकार्य प्रतीत होता है, उसे भी शिव-कृपा से रूपान्तरित किया जा सकता है। इससे अधिक विस्तृत अथवा गूढ़ साधना-विधि का प्रत्यक्ष शास्त्रीय प्रमाण इस विशिष्ट नाम के लिए उपलब्ध नहीं है, अतः यहाँ किसी काल्पनिक साधना-प्रक्रिया का वर्णन करना उचित नहीं समझा गया।
१०. भारतीय चिन्तन में इस नाम का स्थान
शिव-सहस्रनाम में “नागहारधृक्” अकेला नाम नहीं है जो सर्प-सम्बन्ध व्यक्त करता है; स्तोत्र में आगे एक अन्य पृथक् नाम भी सर्प-सम्बन्ध रखता है, जिसका विवेचन आगामी स्वतन्त्र अध्याय में किया जाएगा। यह नाम “व्याघ्रचर्मांबरः” तथा “भस्मोद्धूलितविग्रहः” जैसे निकटवर्ती नामों से भी अर्थ-साम्य रखता है, क्योंकि तीनों ही शिव के उस वेश-विन्यास को व्यक्त करते हैं, जो लोक-दृष्टि में अशुभ अथवा भयकारी वस्तुओं (सर्प, व्याघ्रचर्म, श्मशान-भस्म) को अपनाकर उन्हें मांगल्य में परिणत कर देता है।
यदि यह नाम शिव-तत्त्व की समझ से हटा दिया जाए, तो शिव के उस आयाम की, जिसमें वे संसार के सर्वाधिक त्याज्य एवं भयकारी तत्त्वों को भी अपने में समाहित कर, भय और मांगल्य के बीच की दूरी को मिटा देते हैं, स्पष्ट अभिव्यक्ति में कमी रह जाएगी। शिव केवल शुभ, सौम्य एवं स्वीकार्य वस्तुओं के अधिष्ठाता के रूप में ही समझे जाने लगेंगे, जबकि शैव-चिन्तन का मूल आग्रह यही है कि परम चेतना के लिए जगत में कुछ भी सर्वथा वर्जित अथवा असम्पृक्त नहीं है।
११. आधुनिक जीवन में प्रासंगिकता
आत्म-विकास की दृष्टि से यह नाम व्यक्ति को यह सिखाता है कि आन्तरिक भयों तथा नकारात्मक भावों का दमन करने के स्थान पर उनकी सचेत स्वीकृति एवं रूपान्तरण ही परिपक्वता का मार्ग है। नेतृत्व के क्षेत्र में, जो व्यक्ति संकट अथवा विरोध को दबाने के स्थान पर उसे अपनी शक्ति में परिणत करना जानता है, वह इस नाम के भाव को मूर्त रूप देता है। शिक्षा के सन्दर्भ में, यह नाम उन विद्यार्थियों तथा शिक्षकों के लिए प्रेरणादायी है, जो असफलता अथवा भय को शत्रु मानने के बजाय उसे सीखने के साधन के रूप में स्वीकार करते हैं। परिवार एवं समाज में, यह नाम उस समावेशी दृष्टिकोण को प्रोत्साहित करता है, जो किसी व्यक्ति अथवा समुदाय को केवल उसकी भयावह अथवा असहज प्रतीत होने वाली विशेषताओं के आधार पर बहिष्कृत नहीं करता, अपितु उसे भी समग्रता में स्थान देता है। मानसिक सन्तुलन की दृष्टि से यह नाम विशेष रूप से सार्थक है, क्योंकि आधुनिक मनोविज्ञान भी यही स्वीकार करता है कि दमित भय एवं अस्वीकृत भावनाएँ दीर्घकाल में अधिक हानिकारक होती हैं, जबकि उनकी सचेत स्वीकृति चिकित्सीय दृष्टि से लाभप्रद सिद्ध होती है।
१२. जीवनोपयोगी शिक्षाएँ
“नागहारधृक्” नाम का मूल सन्देश यह है कि जिस वस्तु से हम भागना चाहते हैं, उसी में प्रायः हमारी सबसे बड़ी शक्ति छिपी होती है। यह नाम मनुष्य को यह मौलिक सिद्धान्त सिखाता है कि भय, संकट, विफलता अथवा अस्वीकृत अनुभव—इन सबको बलपूर्वक नष्ट करने अथवा जीवन से बहिष्कृत करने का प्रयास अधिकांशतः असफल रहता है; इसके विपरीत, जब इन्हें पहचानकर, समझकर तथा अनुशासित रूप से आत्मसात् किया जाता है, तभी वे व्यक्तित्व के सुदृढ़ीकरण का साधन बनते हैं। जिस प्रकार शिव सर्प को नष्ट करने अथवा दूर रखने के स्थान पर उसे कण्ठहार बनाकर धारण करते हैं, उसी प्रकार परिपक्व मनुष्य अपने जीवन की कठिनतम परिस्थितियों को शत्रु के रूप में नहीं, अपितु अपने चरित्र के अलंकरण के अवसर के रूप में देखना सीखता है।

यदि कोई व्यक्ति इस नाम के भाव को अपने जीवन में उतारे, तो उसके व्यक्तित्व में अनेक सार्थक परिवर्तन सम्भव हैं। सर्वप्रथम, उसमें भय के प्रति दृष्टिकोण मौलिक रूप से परिवर्तित होगा—भय अब पलायन का कारण नहीं, अपितु आत्म-निरीक्षण तथा आत्म-सुदृढ़ीकरण का अवसर प्रतीत होने लगेगा। द्वितीयतः, ऐसा व्यक्ति दूसरों के प्रति भी अधिक सहिष्णु एवं समावेशी बनेगा, क्योंकि जिसने अपने भीतर के “सर्पों” को स्वीकार करना सीख लिया है, वह दूसरों की त्रुटियों, कमजोरियों अथवा भिन्नताओं को भी सरलता से स्वीकार कर सकेगा। तृतीयतः, संकट-प्रबन्धन की क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि होगी, क्योंकि विपत्ति के समय घबराने अथवा पलायन करने के स्थान पर वह व्यक्ति स्थिति को समझकर उसका सामना करने में समर्थ होगा। अन्ततः, इस भाव को आत्मसात् करने वाला व्यक्ति एक विशिष्ट प्रकार की आन्तरिक निर्भयता तथा गरिमा प्राप्त करता है, जो न तो कृत्रिम साहस है और न ही उपेक्षा-जनित उदासीनता, अपितु भय के यथार्थ को पूर्णतः पहचानकर भी उससे अविचलित रहने की परिपक्व स्थिरता है। यही स्थिरता अन्ततः उस व्यक्ति को अपने परिवेश में एक शान्त, विश्वसनीय तथा प्रेरणादायी उपस्थिति के रूप में स्थापित करती है।
१३. उपसंहार
“नागहारधृक्” नाम शिव के उस अद्वितीय स्वरूप का स्मरण कराता है, जिसमें भय और भूषण, विष और मांगल्य के बीच की सीमा-रेखा विलीन हो जाती है। इस अध्याय में हमने देखा कि व्युत्पत्ति की दृष्टि से यह नाम धारण की स्थायिता को व्यक्त करता है; शास्त्रीय दृष्टि से यह शिवपुराण के सहस्रनाम-पाठ में सुस्थापित है; प्रतीकात्मक दृष्टि से यह भय के आत्मसात्करण का गहन रूपक प्रस्तुत करता है; तथा दार्शनिक दृष्टि से यह अद्वैत के रज्जु-सर्प-न्याय, कश्मीर शैवदर्शन की कुण्डलिनी-अवधारणा एवं योगदर्शन की साधना-प्रक्रिया—इन सभी के साथ अर्थपूर्ण प्रतिध्वनि रखता है। जो तत्त्व साधारण दृष्टि में भय और अस्वीकृति का विषय है, वही परिपक्व, समग्र चेतना के लिए अलंकरण का साधन बन जाता है—यही इस नाम का मर्म है। पाठक के लिए आगे के चिन्तन की दिशा यह हो सकती है कि वह अपने ही जीवन में उन “सर्पों” को पहचानने का प्रयास करे, जिन्हें अब तक उसने दमित अथवा अस्वीकृत रखा है, और उन्हें शिव के इस भाव के अनुसार आत्म-अलंकरण में परिणत करने की दिशा में अग्रसर हो।
लेखककृत कविता
जो त्रास जगत् का सर्प बना, शिव-कण्ठ सजाए फिरता है,
जो विष अमृत बन जाता है, जो भय भूषा बन खिलता है।
इस भाव समझ जो अपना ले, वह जीवन में निर्भय होता,
“नागहारधृक्” शिव इस विधि से, हर बाधा को आभूषण करता॥
(यह काव्यांश इस अध्याय के सार को संक्षेप में प्रस्तुत करने हेतु स्वतन्त्र रूप से रचित है; यह किसी शास्त्रीय स्तोत्र अथवा परम्परागत श्लोक का भाग नहीं है।)
