ॐ पराय देवाय नमः: शिव के परम तत्त्व का रहस्य

शिवसहस्रनाम के “पराय देवाय” नाम में छिपे “पर” के अर्थ, वेदान्त, शैवदर्शन और कश्मीर शैवदर्शन से जुड़े गहन तात्त्विक संकेतों की यात्रा।

शिवसहस्रनाम के विशाल नामावली-भण्डार में कुछ नाम शिव के रूप, गुण अथवा लीला का वर्णन करते हैं, तो कुछ नाम शिव के उस निरुपाधिक, निर्विशेष तत्त्व की ओर संकेत करते हैं जो रूप, गुण और लीला—इन सबसे परे स्थित है। “पराय देवाय नमः” इसी दूसरी कोटि का नाम है। इसमें न कोई आयुध वर्णित है, न कोई वाहन, न कोई कथा-प्रसंग। इसमें केवल दो शब्द हैं—”पर” और “देव”—और इन दो शब्दों के संयोजन से शिव के उस स्वरूप की ओर संकेत किया गया है जो समस्त देवताओं, समस्त सृष्टि-तत्त्वों तथा समस्त द्वैत-सम्बन्धों से अतीत है।

“पर” शब्द भारतीय चिन्तन-परम्परा में अत्यन्त सघन और बहुअर्थी है। यह केवल “श्रेष्ठ” या “उच्चतर” का सूचक नहीं, अपितु “उस पार” का, “सीमा के अतीत” का, “अन्तिम अद्वितीय तत्त्व” का वाचक है। जब यह विशेषण “देव” के साथ जुड़ता है, तो यह शिव को उस देवत्व से भी परे स्थापित करता है जो सामान्यतः देवताओं की कोटि में समझा जाता है। यह नाम इसलिए विशेष महत्त्व रखता है कि यह शिव-तत्त्व को किसी एक देवता के रूप में सीमित होने से रोकता है और उन्हें परम, निरपेक्ष सत्ता के रूप में प्रतिष्ठित करता है।

इस अध्याय में हम देखेंगे कि यह संक्षिप्त प्रतीत होने वाला नाम वस्तुतः वेदान्त, शैवदर्शन और कश्मीर शैवदर्शन—तीनों परम्पराओं में “पर” की अवधारणा से किस प्रकार गहराई से जुड़ा है, और यह किस प्रकार शिव-सहस्रनाम की अन्य नामावलियों को एक तात्त्विक आधार प्रदान करता है।

धातुविचार एवं समासविग्रह

“पराय देवाय नमः” दो पदों तथा एक निपात से निर्मित है—

  • पर — यह शब्द मूलतः सर्वनाम-तुल्य विशेषण है, जिसकी व्युत्पत्ति “पॄ” (पालन-पूरण अर्थ में) अथवा दिशावाचक “परस्” शब्द से मानी जाती है। पाणिनीय व्याकरण में “पर” शब्द सामान्यतः तुलनात्मक अथवा दिशासूचक अर्थ में प्रयुक्त होता है—”इससे आगे”, “इससे परे”, “इससे श्रेष्ठ”। दाता विभक्ति में यह “पराय” रूप धारण करता है।
  • देव — “दिव्” धातु (द्युति अर्थात् प्रकाश अथवा क्रीडा अर्थ में) से निष्पन्न यह शब्द “देवते इति देवः” के रूप में निरुक्त किया जाता है—अर्थात् जो प्रकाशित होता है, जो क्रीडा करता है, अथवा जिसकी कामना की जाती है। “देव” शब्द चतुर्थी विभक्ति में “देवाय” रूप लेता है।
  • नमः — नमन-वाचक निपात, जो समस्त सहस्रनाम-पाठ की संरचना में प्रत्येक नाम के अन्त में प्रयुक्त होकर नमस्कार-भाव को अभिव्यक्त करता है।

समास की दृष्टि से यह विशेषण-विशेष्य सम्बन्ध है—”पर” विशेषण है और “देव” विशेष्य, अर्थात् “जो देव परम् है, उस देव को नमस्कार।”

निरुक्तीय अर्थ एवं वैकल्पिक व्युत्पत्तियाँ

“पर” शब्द का अर्थ-विस्तार भारतीय दार्शनिक साहित्य में अनेक दिशाओं में हुआ है—

  1. स्थानिक अर्थ — “उस पार”, “दूसरी ओर”, जैसे नदी के “पार” जाना।
  2. तुलनात्मक अर्थ — “श्रेष्ठतर”, “उच्चतर”, जैसे “परमगति”, “परमपद”।
  3. सत्तात्मक अर्थ — जो कार्य-कारण शृंखला से अतीत है, जो किसी अन्य पर आश्रित नहीं, जो स्वयं अन्तिम आश्रय है।
  4. द्वैतातीत अर्थ — जो विषय-विषयी, ज्ञाता-ज्ञेय, कर्ता-कर्म आदि समस्त द्वैत-सम्बन्धों से परे है।

इन अर्थ-छायाओं में सबसे गहन अर्थ अन्तिम दो हैं, और शिव-सहस्रनाम के सन्दर्भ में “पराय देवाय” में यही सत्तात्मक तथा द्वैतातीत अर्थ प्रधान है। ध्यातव्य है कि मुण्डकोपनिषद् में “परा विद्या” और “अपरा विद्या” का प्रसिद्ध विभाजन इसी “पर” शब्द के सत्तात्मक अर्थ पर आधारित है, जहाँ “परा विद्या” उस अक्षर-तत्त्व के ज्ञान को कहा गया है जिसके द्वारा अक्षर-पुरुष जाना जाता है। इस प्रकार “पर” शब्द का प्रयोग वैदिक साहित्य में भी अन्तिम, अद्वितीय तत्त्व के लिए सुस्थापित है।

“पर” शब्द उपनिषद्-साहित्य में शिव अथवा ब्रह्म के लिए बहुधा प्रयुक्त हुआ है। श्वेताश्वतर उपनिषद्, जो शैव-वेदान्त की दृष्टि से सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण उपनिषद् मानी जाती है, में रुद्र को बारम्बार “परम्” तथा “देवैकः” जैसे विशेषणों से सम्बोधित किया गया है, यह प्रतिपादित करते हुए कि रुद्र समस्त कारणों के परम कारण तथा समस्त देवताओं से अतीत परम देव हैं।

मुण्डकोपनिषद् में “परा विद्या” की अवधारणा—जिसके द्वारा अक्षर तत्त्व जाना जाता है—”पर” शब्द के दार्शनिक गाम्भीर्य का प्रमाण है। यद्यपि यह प्रसंग सीधे शिव-सहस्रनाम से सम्बद्ध नहीं है, तथापि यह “पर” शब्द के उस अर्थ-क्षेत्र को स्पष्ट करता है जिसके भीतर शिव-सहस्रनाम का यह नाम स्थित है।

महाभारत के अनुशासनपर्व में उपलब्ध शिव-सहस्रनाम-पाठ में शिव को अनेक स्थानों पर “पर” उपसर्ग से युक्त नामों से सम्बोधित किया गया है, जैसे “परमेष्ठी”, “परः”, “परायण” इत्यादि। यह दर्शाता है कि “पर” की अवधारणा शिव-सहस्रनाम की सम्पूर्ण संरचना में एक बीज-तत्त्व के रूप में व्याप्त है, जिसका उद्देश्य शिव को समस्त देवत्व-कल्पनाओं की अन्तिम सीमा पर, अथवा उससे भी परे, प्रतिष्ठित करना है।

इस विषय में यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि “पराय देवाय नमः” के रूप में इस ठीक शब्द-संयोजन का पृथक्, स्वतन्त्र पौराणिक कथा-प्रसंग अथवा टीका-विशेष उपलब्ध सामग्री में प्रत्यक्ष रूप से नहीं मिलता। अतः जहाँ प्रत्यक्ष शास्त्रीय प्रमाण उपलब्ध नहीं है, वहाँ हम कल्पना अथवा अनुमानित कथा प्रस्तुत करने के स्थान पर “पर” की सुस्थापित शास्त्रीय एवं दार्शनिक अवधारणा के आधार पर ही इस नाम का विवेचन करना उचित समझते हैं।

पुराण-साहित्य में शिव के “पर” स्वरूप का वर्णन प्रायः कथा के रूप में नहीं, अपितु स्तुति एवं तत्त्व-निरूपण के रूप में मिलता है। शिवपुराण तथा लिङ्गपुराण में अनेक स्तुतियों में शिव को “परात्पर” (परसे भी पर) कहा गया है, विशेषतः उन प्रसंगों में जहाँ ब्रह्मा और विष्णु के मध्य श्रेष्ठता-विवाद के समाधानस्वरूप शिव अनन्त लिङ्ग के रूप में प्रकट होते हैं। इस प्रसिद्ध लिङ्गोद्भव-कथा में शिव का सन्देश यही है कि वे किसी तुलनात्मक श्रेष्ठता की कोटि में नहीं, अपितु उस कोटि से ही परे स्थित हैं जहाँ तुलना सम्भव होती है। यही भाव “पराय देवाय” नाम में संकेतित है, यद्यपि इस विशिष्ट पद-संयोजन के साथ प्रत्यक्ष कथा-सूत्र उपलब्ध सामग्री में स्पष्ट नहीं है।

कूर्मपुराण तथा वायुपुराण में भी शिव के परब्रह्म-स्वरूप का निरूपण करने वाले अनेक अंश मिलते हैं, जहाँ शिव को सृष्टि, स्थिति और संहार—तीनों कार्यों के मूल में स्थित, किन्तु स्वयं उन कार्यों से अलिप्त तत्त्व के रूप में वर्णित किया गया है। यह अलिप्तता ही “पर” की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण पौराणिक अभिव्यक्ति है।

“पराय देवाय” नाम का प्रतीकात्मक मूल्य इसकी अमूर्तता में निहित है। जहाँ शिव के अनेक नाम किसी विशिष्ट रूप, भाव अथवा घटना से जुड़े होते हैं, वहाँ यह नाम साधक को किसी भी रूप-कल्पना से आगे ले जाने का कार्य करता है। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से यह उस अवस्था का सूचक है जहाँ मन अपनी समस्त तुलनात्मक प्रवृत्तियों—श्रेष्ठ-निकृष्ट, स्व-पर, उच्च-निम्न—से मुक्त होकर उस साक्षी-तत्त्व की ओर उन्मुख होता है जो इन सब भेदों का आधार होते हुए भी उनसे अस्पृष्ट रहता है।

मानवीय अनुभव में “पर” की खोज एक स्वाभाविक प्रवृत्ति है—प्रत्येक उपलब्धि के पश्चात् मन तुरन्त “इससे आगे क्या है” पूछने लगता है। यह असन्तोष, जो सामान्यतः बाह्य उपलब्धियों की ओर व्यक्ति को दौड़ाता रहता है, वस्तुतः उसी परम तत्त्व की अन्तर्निहित स्मृति है जिसे “पराय देवाय” नाम इंगित करता है। साधक जब इस बाह्य दौड़ को भीतर की ओर मोड़ता है, तब वह समझता है कि जिस “पर” की खोज वह बाहर कर रहा था, वह वस्तुतः उसकी अपनी चेतना का मूल स्वभाव है।

अद्वैत वेदान्त की दृष्टि

अद्वैत वेदान्त में “पर ब्रह्म” की अवधारणा केन्द्रीय है। शंकराचार्य-परम्परा में ब्रह्म को दो दृष्टियों से देखा जाता है—सगुण (अपर) तथा निर्गुण (पर)। “पराय देवाय” नाम शिव को इस निर्गुण, निरुपाधिक ब्रह्म-स्वरूप में प्रतिष्ठित करता है। यहाँ “देव” शब्द का प्रयोग रोचक है, क्योंकि सामान्यतः “देव” सगुण उपासना से जुड़ा शब्द है, किन्तु “पर” विशेषण के साथ यह शब्द निर्गुण तत्त्व की ओर संकेत करने लगता है—अर्थात् यह नाम सगुण और निर्गुण के बीच के सेतु का कार्य करता है।

शैवदर्शन एवं कश्मीर शैवदर्शन

कश्मीर शैवदर्शन में “पर” शब्द का प्रयोग विशेष तात्त्विक अर्थ में हुआ है। अभिनवगुप्त तथा क्षेमराज की परम्परा में वाक् अर्थात् शब्द-तत्त्व के तीन स्तर माने गए हैं—परा, पश्यन्ती, मध्यमा तथा वैखरी की चतुर्विध शृंखला में “परा वाक्” सर्वोच्च, अविभक्त, स्पन्दमात्र अवस्था है, जिससे शेष तीनों स्तर क्रमशः अभिव्यक्त होते हैं। इसी परम्परा में परा, परापरा तथा अपरा—इन तीन शक्तियों का त्रिक भी वर्णित है, जो क्रमशः अभेद, भेदाभेद तथा भेद की अवस्थाओं का प्रतिनिधित्व करती हैं। “पराय देवाय” नाम में निहित “पर” इसी परा-शक्ति के स्तर की ओर संकेत करता प्रतीत होता है, जहाँ शिव और शक्ति में कोई भेद प्रतीत नहीं होता, तथा सम्पूर्ण अभिव्यक्ति स्पन्दमात्र, अविभक्त चेतना के रूप में विद्यमान रहती है।

योगदर्शन एवं भक्तिपरम्परा

योगदर्शन में “पर वैराग्य” की अवधारणा—जो गुण-मात्र के प्रति भी अनासक्ति की चरम अवस्था है—इसी “पर” भाव से सम्बद्ध है। भक्ति-परम्परा में यद्यपि “पर” शब्द निर्गुण-बोध से जुड़ा होने के कारण अपेक्षाकृत कम प्रयुक्त होता है, तथापि भक्त के लिए यह नाम एक सीमा-स्मारक का कार्य करता है—यह स्मरण कराता है कि जिस इष्टदेव की वे उपासना कर रहे हैं, वह किसी सीमित रूप में बद्ध नहीं, अपितु सगुण रूप के परे भी विद्यमान परम तत्त्व है।

चूँकि “पर” तत्त्व मूलतः निराकार एवं निर्गुण है, अतः इसका कोई विशिष्ट मूर्त प्रतीक अथवा आयुध-वर्णन शास्त्रों में उपलब्ध नहीं है। तथापि, भारतीय प्रतिमा-परम्परा में शिव के इस निर्गुण पक्ष को सर्वाधिक सशक्त रूप से निष्कल लिङ्ग के माध्यम से अभिव्यक्त किया गया है—अर्थात् बिना किसी मुख अथवा अंग-विभाजन के केवल स्तम्भाकार लिङ्ग, जो किसी विशिष्ट रूप में सीमित न होकर अनन्तता का द्योतक है। इसके विपरीत जहाँ शिव के मुखादि अंकित होते हैं (सद्योजातादि पञ्चमुख), वह “सकल” अथवा “सकल-निष्कल” स्वरूप कहलाता है, जो सगुण-निर्गुण के मध्यवर्ती स्तर का प्रतिनिधित्व करता है।

यन्त्र-परम्परा में भी बिन्दु—जो समस्त रेखाओं, त्रिकोणों तथा आवरणों से पूर्व, केन्द्रीय, अविभाज्य स्थिति है—”पर” तत्त्व का सांकेतिक निरूपण माना जाता है। बिन्दु से ही सम्पूर्ण यन्त्र-रचना का विस्तार होता है, किन्तु बिन्दु स्वयं उस विस्तार से अस्पृष्ट रहता है।

शिव-सहस्रनाम-पाठ में प्रत्येक नाम की मन्त्रात्मक संरचना समान है—नाम के पश्चात् “नमः” निपात का प्रयोग, जो उस नाम को स्वतन्त्र उपासना-मन्त्र का स्वरूप प्रदान करता है। “ॐ पराय देवाय नमः” के ध्वनि-विन्यास में तीन शब्द-खण्ड हैं—प्रणव “ॐ”, विशेषण-विशेष्य युग्म “पराय देवाय”, तथा नमस्कार-वाचक “नमः”।

अक्षरार्थ की दृष्टि से “पर” शब्द में “प” वर्ण—जो पवन-तत्त्व तथा प्राण-शक्ति से सम्बद्ध माना जाता है—तथा “र” वर्ण—जो अग्नि-तत्त्व एवं तेजस् का सूचक है—का संयोग ध्यातव्य है। यद्यपि इस प्रकार के अक्षर-विश्लेषण को शास्त्रीय तन्त्र-परम्परा में सैद्धान्तिक आधार प्राप्त है, तथापि इस विशिष्ट नाम के लिए कोई पृथक् नाद-विषयक टीका उपलब्ध सामग्री में नहीं मिलती, अतः यह विवेचन सामान्य वर्णमाला-सिद्धान्त के आधार पर प्रस्तुत किया गया है, न कि किसी विशिष्ट शास्त्रीय उद्धरण के आधार पर।

जप-परम्परा में इस नाम का उच्चारण सामान्यतः शिव-सहस्रनाम के सम्पूर्ण पाठ के अन्तर्गत ही होता है; इसे पृथक् जप-मन्त्र के रूप में प्रचलित करने का कोई स्वतन्त्र, सुस्थापित परम्परा उपलब्ध सामग्री में प्रमाणित नहीं होती।

इस नाम पर ध्यान करने की पारम्परिक विधि सामान्यतः निर्गुण-ध्यान की कोटि में आती है। साधक सर्वप्रथम शिव के किसी सगुण रूप—ज्योतिर्लिङ्ग, नटराज अथवा ध्यानस्थ योगी—का चिन्तन करता है, तत्पश्चात् क्रमशः उस रूप के भी अतीत, निराकार, निर्विशेष तत्त्व की ओर मन को उन्मुख करता है। यह प्रक्रिया “नेति नेति” की उपनिषदिक पद्धति के समान है, जहाँ मन प्रत्येक ज्ञात रूप, गुण अथवा विशेषता का निषेध करते हुए उस अन्तिम तत्त्व तक पहुँचता है जिसका निषेध सम्भव नहीं।

मनोवैज्ञानिक दृष्टि से इस प्रकार की साधना का प्रभाव तुलनात्मक चिन्तन के शमन में देखा जाता है। जो साधक नियमित रूप से “पर” भाव का चिन्तन करता है, उसमें धीरे-धीरे श्रेष्ठता-निकृष्टता, सफलता-असफलता जैसे द्वन्द्वात्मक विचारों की तीव्रता कम होती जाती है, क्योंकि मन बारम्बार उस तत्त्व का स्मरण करता है जो इन समस्त द्वन्द्वों से अतीत है। यह साधना-विधि सुरक्षित एवं पारम्परिक है, तथा इसके लिए किसी विशेष दीक्षा अथवा जोखिमपूर्ण अभ्यास की आवश्यकता नहीं—यह मूलतः चिन्तन एवं स्मरण की साधना है।

समकालीन जीवन तुलना पर आधारित है—सामाजिक माध्यमों से लेकर कार्यक्षेत्र तक, व्यक्ति निरन्तर स्वयं को दूसरों से, अपनी वर्तमान स्थिति को भूतकाल अथवा भविष्य की कल्पित स्थिति से तौलता रहता है। “पराय देवाय” नाम इस तुलनात्मक चक्र से बाहर निकलने का एक सूक्ष्म किन्तु सशक्त उपकरण प्रस्तुत करता है। यह स्मरण कराता है कि प्रत्येक तुलना अन्ततः किसी न किसी सीमा के भीतर होती है, और वास्तविक स्थिरता उस तत्त्व के बोध में है जो समस्त तुलनाओं से परे है।

नेतृत्व के क्षेत्र में भी यह भाव उपयोगी है—जो नेता अपनी पहचान को पद, उपलब्धि अथवा तुलनात्मक श्रेष्ठता से नहीं, अपितु एक स्थिर, अपरिवर्तनशील आन्तरिक केन्द्र से जोड़ता है, वह बाह्य उतार-चढ़ाव में भी सन्तुलन बनाए रख सकता है।

शिव-सहस्रनाम में “पर” उपसर्ग से युक्त अनेक नाम हैं—परमेष्ठी, परः, परायण, परात्पर आदि—किन्तु “पराय देवाय” इन सबमें विशिष्ट है क्योंकि यह “पर” को सीधे “देव” शब्द से जोड़कर शिव के देवत्व को ही अतिक्रमित कर देता है। अन्य नाम प्रायः “पर” को स्थान, गति अथवा आश्रय के अर्थ में प्रयुक्त करते हैं (जैसे “परायण”—जिसका परम आश्रय हो), जबकि यह नाम सीधे शिव के स्वरूप को ही “पर” घोषित करता है।

यदि इस नाम को शिव-तत्त्व की समझ से हटा दिया जाए, तो शिव-सहस्रनाम की सम्पूर्ण नामावली एक निश्चित जोखिम से गुज़रेगी—वह जोखिम है शिव को केवल एक देवता, एक इष्ट, एक सीमित रूप के रूप में सीमित कर देने का। “पराय देवाय” नाम प्रत्येक अन्य नाम को यह स्मरण दिलाता रहता है कि इन सहस्र नामों के द्वारा जिस तत्त्व की स्तुति की जा रही है, वह अन्ततः किसी भी नाम, रूप अथवा गुण से बद्ध नहीं है। यह नाम, संक्षेप में, सम्पूर्ण सहस्रनाम-पाठ की तात्त्विक कुंजी के समान कार्य करता है।

“पराय देवाय नमः” नाम का सबसे मूल जीवन-सिद्धान्त यह है कि प्रत्येक व्यक्ति के भीतर एक ऐसा तत्त्व विद्यमान है जो उसकी उपलब्धियों, असफलताओं, सामाजिक पहचान अथवा तुलनात्मक स्थिति से परे और अप्रभावित रहता है। जब तक व्यक्ति अपनी पहचान को बाह्य उपलब्धियों, पदवियों अथवा दूसरों से तुलना पर आधारित रखता है, तब तक वह स्थायी असन्तोष का शिकार बना रहता है, क्योंकि बाह्य जगत् में सदैव कोई न कोई “श्रेष्ठतर” उपस्थित रहता है। यह नाम सिखाता है कि वास्तविक स्थिरता तुलना की समाप्ति में नहीं, अपितु तुलना के आधार को ही पहचानने में है—अर्थात् उस साक्षी-चेतना को पहचानने में, जो प्रत्येक तुलना को देखती है किन्तु स्वयं उससे अस्पृष्ट रहती है।

यदि कोई व्यक्ति इस भाव को अपने जीवन में उतारे, तो उसके व्यक्तित्व में कई सूक्ष्म किन्तु सुदृढ़ परिवर्तन सम्भव हैं। सर्वप्रथम, वह ईर्ष्या तथा अहंकार—दोनों प्रवृत्तियों से क्रमशः मुक्त होने लगता है, क्योंकि दोनों ही तुलनात्मक चेतना से उत्पन्न होती हैं। दूसरे, वह असफलता को व्यक्तिगत अपमान के रूप में लेने के स्थान पर एक अस्थायी, पार करने योग्य अनुभव के रूप में देखने लगता है। तीसरे, उसमें दूसरों के प्रति एक स्वाभाविक सम्मान विकसित होता है, क्योंकि जब स्वयं की पहचान तुलना पर आधारित नहीं रहती, तब दूसरों की उपलब्धि भय अथवा प्रतिस्पर्धा का विषय नहीं रह जाती। अन्ततः, यह भाव व्यक्ति को एक ऐसी आन्तरिक स्थिरता प्रदान करता है जो बाह्य परिस्थितियों—प्रशंसा हो या निन्दा, सफलता हो या असफलता—से अप्रभावित रहती है। यही स्थिरता भारतीय परम्परा में “स्थितप्रज्ञता” कही गई है, और “पराय देवाय” नाम का चिन्तन इस स्थितप्रज्ञता की दिशा में एक ठोस, व्यावहारिक कदम है।

“ॐ पराय देवाय नमः” शिव-सहस्रनाम का वह नाम है जो सबसे कम शब्दों में सबसे व्यापक तात्त्विक कथन करता है। इसमें न कोई कथा है, न कोई आयुध, न कोई विशिष्ट रूप-वर्णन—इसमें केवल एक उद्घोषणा है: शिव देव हैं, किन्तु देवत्व की सीमा में बद्ध देव नहीं, अपितु देवत्व से भी परे स्थित परम तत्त्व।

इस अध्याय में हमने देखा कि यह नाम वैदिक “परा विद्या”, वेदान्त के “पर ब्रह्म”, तथा कश्मीर शैवदर्शन की “परा शक्ति”—इन तीनों परम्पराओं के तात्त्विक सूत्रों को एक ही पद-युग्म में समाहित कर देता है। जहाँ प्रत्यक्ष शास्त्रीय उद्धरण अथवा पौराणिक कथा-प्रसंग सीमित उपलब्ध थे, वहाँ हमने भाषावैज्ञानिक, दार्शनिक तथा मनोवैज्ञानिक विश्लेषण के माध्यम से इस नाम की गहराई को उद्घाटित करने का प्रयास किया है, बिना किसी कल्पित उद्धरण अथवा गढ़ी हुई कथा का सहारा लिए।

पाठक के लिए आगे के चिन्तन हेतु यह प्रश्न छोड़ा जा सकता है—यदि शिव सभी देवत्व-कल्पनाओं से “पर” हैं, तो साधक की उपासना, जो अनिवार्यतः किसी रूप, नाम अथवा भाव के माध्यम से ही सम्भव होती है, उस “पर” तत्त्व तक किस प्रकार पहुँचती है? यह प्रश्न सगुण और निर्गुण उपासना के बीच के उस सेतु की ओर संकेत करता है, जिसका विवेचन शिव-सहस्रनाम के आगामी नामों में क्रमशः विकसित होता रहेगा।